मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

513 Posts

1199 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3358 postid : 1225752

मौन संघर्ष की समाप्ति और सवाल

Posted On: 9 Aug, 2016 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

सोलह वर्ष से चला आ रहा अनशन आज समाप्त करने की घोषणा मणिपुर की आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला ने की. ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (AFSPA-अफस्पा)’ को ख़तम करने के लिए शुरू किया गया उनका अनशन संभव है कि युवा भावुकता के साथ आरम्भ हुआ हो किन्तु उसका एकाएक समापन भावुकता के कारण नहीं हुआ है. AFSPA-अफस्पा वह विशेष कानून है जो पूर्वोत्तर राज्यों के विभिन्न हिस्सों में लागू है. इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को किसी को भी देखते ही गोली मारने या बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार है. शर्मिला इसके खिलाफ इम्फाल के जस्ट पीस फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संगठन से जुड़कर भूख हड़ताल कर रही हैं. मणिपुर के ईटानगर के एक कस्बे में नवम्बर 2000 में सैनिकों की गोलीबारी में 10 नागरिक मारे गए थे. उनमें से कोई भी इरोम का दोस्त या रिश्तेदार नहीं था किन्तु इरोम इससे बहुत विचलित हुई. इस एक घटना के परिणामस्वरूप अट्ठाईस वर्षीय लड़की ने अनशन करने का मन बनाया. इरोम ने इसके लिए किसी से चर्चा नहीं की, अपने किसी दोस्त, रिश्तेदार, संगठन आदि को भी नहीं बताया. अपनी माँ के पास आकर उनका आशीर्वाद लिया और अपना अनशन शुरू कर दिया. परिवार वालों को बाद में पता चला कि इरोम ने AFSPA-अफस्पा हटाने के लिए भूख हड़ताल करने का फ़ैसला लिया है.

2016_7$largeimg231_Jul_2016_002606927

उस समय मालोम गाँव, जहाँ उक्त घटना घटित हुई थी, के लोग भी नहीं चाहते थे कि इरोम वहाँ भूख हड़ताल करें. उन्हें डर था कि इस कारण ग्रामवासियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं. धारे-धीरे लोग इरोम के समर्थन में जुटने लगे. शुरूआती दौर में इसे युवा जोश मानकर शासन-प्रशासन द्वारा बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया. बाद में भूख हड़ताल लंबी खिचने पर इरोम पर आत्महत्या करने का आरोप लगा कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद से उनको लगातार हिरासत में ही रखा गया. न्यायालय में उनसे अनशन समाप्त करने के बारे में पूछा जाता और उनका जवाब हर बार न में होता. सरकार ने शर्मिला को आत्महत्या के प्रयास में गिरफ्तार किया था और ऐसी गिरफ्तारी एक साल से अधिक नहीं हो सकती अतः हर साल उन्हें रिहा करते ही दोबारा गिरफ्तार कर लिया जाता था. नाक से लगी एक नली के द्वारा उनको भोजन दिया जाता. बार-बार गिरफ़्तारी और नली के सहारे भोजन देने की प्रक्रिया के चलते एक सरकारी अस्पताल के एक कमरे को अस्थायी जेल बना दिया गया था. यद्यपि इरोम को 20 अगस्त 2014 को सेशन कोर्ट के आदेश से रिहा कर दिया गया किन्तु मणिपुर की राजधानी इंफाल के लगभग बीचों-बीच बना यही अस्पताल एक दशक से भी ज़्यादा समय से इरोम शर्मिला का घर रहा है. इन सोलह वर्षों में इरोम ने एक तरह की तपस्या सी की. उन्हें हर पन्द्रह दिन पर इंफाल के जवाहर लाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज से कोर्ट ले जाया जाता रहा. उनकी गाड़ी उनके असली घर के सामने से गुज़रती. किन्तु इरोम ने अपनी माँ से लिए प्रण के चलते उनसे या अपने परिजनों से मिलने की कोशिश नहीं की. बाकी बाहरी लोगों को उनसे मिलने की अनुमति भी नहीं थी. विशेष परिस्थितियों में, विशेष अनुमति के बाद कुछ लोगों को उनसे मिलवाया गया. सोलह वर्षों से अस्पताल ही उनकी दुनिया रहा है. इन सालों में उनकी जीभ ने किसी खाद्य-पदार्थ का स्वाद नहीं चखा. इस दौरान उनका ब्रश करना रुई के सहारे रहा ताकि और बिना पानी गलती से उनके होठों को न छू जाए.

इस विषम स्थिति के बाद, सोलह वर्षों से नाक की नली से दिए जाते भोजन के सहारे जिन्दा इरोम का अनशन समाप्त करने का फैसला उतना ही चौंकाने वाला रहा जितना कि अनशन शुरू करने वाला था. अनशन समाप्त करना, अपने ब्रिटिश प्रेमी-सहयोगी से विवाह करने तथा चुनाव लड़ने की घोषणा से लगता है कि उनके अनशन का आरम्भ भले ही युवा भावुकता हो किन्तु उसका समापन भावुकता की परिणति कदापि नहीं है. मीडिया में उनके अनशन समाप्ति को, उनके द्वारा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में उतरने को क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है. सम्भावना जताई जा रही है कि इरोम के लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने के बाद उनके संघर्ष को धार मिलेगी. माना जा रहा है कि राजनीति में बढ़ते जा रहे अँधियारे के बीच इरोम जैसे संघर्षशील लोग रौशनी का कार्य कर सकते हैं. और भी कई-कई सम्भावनाओं पर विचार किया जा रहा है. अनेकानेक भावी क़दमों की अपेक्षा की जा रही है. जिस समय इरोम ने अनशन शुरू किया था, उस समय भी किसी ने उसका भविष्य नहीं जाना था. अब जबकि उनका अनशन समाप्त हो चुका है कोई नहीं कह सकता कि भविष्य क्या होगा. सम्भावनाओं, अपेक्षाओं के बीच जो मूल बिन्दु सामने आता है वो यह कि आखिर इतने लम्बे संघर्ष के बाद हासिल क्या हुआ? जिस AFSPA-अफस्पा के लिए उनका अनशन चल रहा था उसमें किंचित मात्र भी संशोधन नहीं किया गया. ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सोलह वर्षों के अपने संघर्ष के बाद भी किसी तरह का परिणाम न आते देख इरोम अन्दर से टूटने लगी हों? अपना अनशन उनको निरर्थक समझ आने लगा हो? समाज में रहने के बाद भी सामाजिक स्थितियों से दूर रखी गई इरोम के भीतर नैराश्य न जन्मने लगा हो? युवा आँखों के सपनों के असमय मरने का डर पैदा न हो गया हो? अनशन समाप्ति की घोषणा के साथ ही साथ विवाह करने और चुनाव लड़ने की घोषणा ऐसे सवालों को जन्म देती ही है. बहरहाल अंतिम सत्य क्या है इसे सिर्फ इरोम ही जानती है, वही बता सकती है. इरोम का अनशन समाप्त करना यदि सवालों को जन्म देता है तो इतनी लम्बी समयावधि में सरकारों की चुप्पी भी अनेक सवालों को जन्म देती है. क्या शांतिपूर्ण चलने वाले अनशन का कोई महत्त्व नहीं? क्या अकेले व्यक्ति का संघर्ष सकारात्मक परिणाम लाने के लिए सरकार को मजबूर नहीं कर सकता? AFSPA-अफस्पा समाप्त करना सरकारों को भले ही तर्कसंगत न लगता हो किन्तु सोलह वर्षों के संघर्ष को नजरअंदाज करना क्या तर्कसंगत है?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
16/08/2016

बहुत ही अच्छा एवं सामयिक प्रश्न उठाता हुआ महत्वपूर्ण लेख है डॉक्टर साहब आपका । सचमुच सोलह वर्षों के निष्ठापूर्ण एवं अहिंसक संघर्ष को अनदेखा करना न तो तर्कसंगत है एवं न ही न्यायपूर्ण । सभी सरकारों ने ऐसा करके शर्मिला के प्रति ही नहीं सम्पूर्ण समाज के प्रति अन्याय किया है तथा इस कष्टप्रद यथार्थ की ही पुष्टि की है कि शासन-प्रशासन केवल हिंसक आंदोलनकारियों की ही सुनता है एवं उनकी अनुचित माँगों के सामने घुटने टेक देने को भी तैयार रहता है जबकि पूर्णतः अहिंसक सत्याग्रही के संघर्ष एवं तर्कसंगत माँग पर न्यूनतम आवश्यक ध्यान भी नहीं देता । ऐसा दृष्टिकोण अपने आप में ही अन्यायपूर्ण है । शर्मिला के अनशन के पीछे ठोस तथ्य एवं तर्क थे एवं उसकी मूल भावना तथा अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा अत्यंत सराहनीय है तथा सत्य के पथ पर चलने वाले अहिंसक लोगों के लिए प्रेरणा-स्रोत है ।


topic of the week



latest from jagran