मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

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भीड़ की हकीकत

Posted On: 16 Nov, 2016 में

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बड़े नोटों पर प्रतिबन्ध लगने के बाद बैंकों और डाकघरों के सामने लगातार लम्बी-लम्बी लाइन देखने को मिल रही हैं. इनमें लगे लोगों में बहुतायत वे लोग हैं जो चलन से बाहर कर दिए गए नोटों को जमा करने के बजाय बदलने के लिए खड़े हुए हैं. केंद्र सरकार द्वारा जाली नोट और काले धन पर अंकुश लगाने की दृष्टि से पाँच सौ और एक हजार रुपये के नोट पर प्रतिबन्ध लगा दिया. ऐसे में बाजार में अनावश्यक हड़बड़ी मच गई. लोगों में अनचाहे रूप से ये सन्देश चला गया कि नोट बंद हो गए हैं. ऐसे में लोगों ने अपने पास संग्रहीत पुराने बड़े नोटों को बजाय बैंक में जमा करने के उनको बदलना ज्यादा उपयुक्त समझा. चूँकि बंदी के बाद से लगातार एटीएम बंद अथवा नहीं के बराबर काम कर रहे हैं. इसके चलते आम जनमानस ने अपनी सोच से सही कदम ही उठाया. सरकार द्वारा नोट बदलने की सुविधा देने के पीछे उद्देश्य ये था कि नोटबंदी के चलते जनता के पास रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु धन की उपलब्धता बनी रहे. आवश्यकता की पूर्ति हेतु धन के बदलाव के साथ जहाँ जनता ने सौ-सौ रुपये के नोटों का संग्रह करना शुरू कर दिया वहीं आय से अधिक धन रखे लोग भी ऐसे कृत्य के लिए सक्रिय हो गए. बैंकों या डाकघरों के सामने बढ़ती जा रही भीड़ का कुछ और ही समाजशास्त्र, दूसरी तरह का मनोविज्ञान ही सामने आने लगा.

आम नागरिक के हितार्थ किसी भी बैंक से नोट बदलने की सुविधा का दुरुपयोग उन लोगों द्वारा किया जाने लगा जो अवैध रूप से धन का संचय किये हुए हैं. उनके द्वारा लाइन में लगने के बदले पारिश्रमिक देकर मजदूरों, गरीबों को इस काम में लगाया जाने लगा. एक दिन का अथवा कुछ घंटों का मेहनताना दो सौ रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक दिए जाने से बैंकों/डाकघरों में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. अवैध धन का संचय किये हुए लोगों को ऐसे मजबूर लोगों की, मजदूर किस्म के लोगों की उपलब्धता भी सहजता से इस कारण हो गई क्योंकि नोटों के प्रतिबंधित होने और नए नोटों के सामान्य रूप में चलन में न आ पाने के कारण मजदूरों को, कामगारों को काम नहीं मिल रहा था. नोटों के प्रतिबन्ध और अवैध धन की उपलब्धता ने मजदूरों और धनिकों के मध्य माँग और आपूर्ति के सिद्धांत को जन्म दिया. काम न मिलने से परेशान व्यक्तियों को जहाँ काम, धन की जरूरत महसूस हुई वहीं धन खपाने वालों को व्यक्तियों की आवश्यकता थी. दोनों पक्षों के अपने-अपने हितों की खातिर बैंकों, डाकघरों के सामने की भीड़ दिनोंदिन कम होने के बजाय बढ़ती ही रही. इस किराये की भीड़ का दुष्परिणाम ये होने लगा कि वे व्यक्ति नाहक परेशानी का शिकार होने लगे जिन्हें वाकई धन की आवश्यकता है. जिनके लिए नोटों का बदला जाना वाकई अपरिहार्य है. लम्बी-लम्बी लाइन के कारण बुजुर्गों को, महिलाओं को अत्यधिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है.

बैंकों, डाकघरों में भीड़ बढ़ने, लाइन बढ़ने का कारण सिर्फ नोट बदलना नहीं, सिर्फ मजदूरी पा लेना नहीं वरन भीड़ की मानसिकता भी है. बहुसंख्यक जनता भीड़ बढ़ाने, लाइन बढ़ाने की मानसिकता से ग्रसित होती है. अफवाहों का बाज़ार यहाँ जल्द गर्म होने लगता है. ऐसे में अंदरूनी रूप से ये अफवाह कि नोट बाज़ार में सभी सहजता से उपलब्ध नहीं होंगे, लोगों में संचय की प्रवृत्ति जाग गई. इसके साथ-साथ मुफ्त के सामान से लेकर आवश्यक वस्तुओं के संग्रह तक, ग्रीन कार्ड बनवाने से लेकर सिम लेने तक, आधार कार्ड बनवाने से लेकर राशनकार्ड बनवाने तक, मंदिर में जाने से लेकर राहत सामग्री लेने तक सब जगह भीड़ की मानसिकता अधिक से अधिक बटोर लेने की होती है, सबसे पहले प्राप्त कर लेने की होती है. इस मानसिकता ने भी बैंकों, डाकघरों में भीड़ को बढ़ाया है. ऐसे में लोगों का बैंक, डाकघर जाकर लाइन लगाना, भीड़ बढ़ाना कम होगा, कहा नहीं जा सकता. यद्यपि केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर सही कदम उठाया था किन्तु जनता की हड़बड़ी के कारण और धनकुबेरों के चंद रुपये ठिकाने लगाये जाने की मानसिकता के कारण भीड़ में कमी नहीं आ रही है. इसके साथ-साथ कुछ बिन्दुओं पर सरकारी तैयारियाँ भी अपेक्षित प्रतीत नहीं हो रही. नए नोटों का बाज़ार में, बैंकों में समय से उपलब्ध न हो पाना, एटीएम में नए नोटों की निकासी सम्बन्धी सॉफ्टवेयर की अनुपलब्धता, मशीन में नए नोट के आकार के खाँचे का न होना भी भीड़ बढ़ने के कारण बने. सरकार को शुरूआती दौर में नोट बदलने के लिए दिन का निर्धारण कर देना चाहिए था. जिस बैंक में खाता हो उसी में नोटों का बदलाव हो जैसा प्रावधान किया जाना चाहिए था. इससे एक तो सप्ताह के सभी दिनों में बैंकों, डाकघरों में भीड़ नहीं रहती. इसके साथ-साथ सभी बैंकों, डाकघरों में भी भीड़ नहीं होती. असल में सभी बैंकों से नोटों को बदलने की सुविधा का दुरुपयोग उन्हीं लोगों द्वारा किया जाने लगा जो लाइन में खड़े होने का भुगतान कर रहे हैं, भुगतान ले रहे हैं. एक बार नोट बदल कर भाड़े के मजदूर किसी दूसरी बैंक की लाइन में जाकर वहाँ भीड़ बढ़ाने लगे. हालाँकि सरकार द्वारा अब नोट परिवर्तन के समय स्याही लगाने का फैसला किया है देखना ये है कि भीड़ बढ़ाने वाली, लाइन लगाने वाली मानसिकता से ग्रसित जनता पर इस फैसले का कितना प्रभाव पड़ता है.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

harendra rawat के द्वारा
21/11/2016

डॉक्टर कुमारेन्द्रजी नमस्कार ! बैंकों डाकघरों में भीड़ बढ़ने का यही कारण है की काले धन के काले दिल वाले आम आदमी की परेशानियां बढ़ाने के लिए ध्याड़ी पर मजदूरों को हर बैंक व् पोस्ट आफिसों के सामने लाइन में खड़ा कर रहे हैं ! इसमें विपक्ष के नेताओं के चमचे भी सामिल हैं ! सरकार को उन बेशर्म नेताओं का भी भंडाफोड़ करना चाहिए ! लेख के लिए साधुवाद !

L.S.Bisht के द्वारा
21/11/2016

 आदरणीय डा कुमारेन्द्र सेंगर जी । सही लिखा है आपने । भीड उन लोगों की है जो या तो कमीशन पर या दिहाडी पर दूसरों का काला धन सफेद करने के लिए लाइन मे ख्डे हैं । कुछ वह लोग भी हैं जिन्हे जरा सी कमी होने पर जमाखोरी की आदत होती है । देखिए कब कम् होती है यह भीड ।


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