मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

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सकारात्मकता की आस

Posted On: 19 Nov, 2016 में

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दिशाहीन राजनीति को दिशा मिलने की सम्भावना नजर आती दिख रही है, केंद्र सरकार के नोटबंदी के निर्णय से. संभव है कि जो लोग नोटबंदी फैसले के विरोध में हैं वे इससे इत्तेफाक न रखें. इसके लिए थोड़ा पीछे जाकर देखने की आवश्यकता है. विगत एक-दो दशक की राजनीति में जिस तरह से माफियाओं का, धनबल का, बाहुबल का, अपराधियों का प्रवेश हुआ है उससे आम जनमानस के मन से राजनीति के लिए सम्मान भाव समाप्त सा हो गया था. लोगों के मन में एक विचार गहरे से पैठ गया था कि राजनीति निकृष्ट कोटि का काम हो गया है. राजनीति को न जाने कितने अपमानजनक विशेषणों से नवाजा जाने लगा था. जनता की इस नकारात्मकता का प्रभाव राजनीतिज्ञों पर भी हुआ. राजनीति के अपराधीकरण और अपराधियों के राजनीतिकरण ने अच्छे-बुरे का भेद समाप्त कर दिया. राजनीति में सक्रिय भले लोगों की पहचान धीरे-धीरे संकट में पड़ने लगी. यहाँ पूरी तरह से धनबल, बाहुबल का वर्चस्व दिखाई देने लगा. भू-माफिया, बालू-माफिया, अपराधी आदि जबरदस्त तरीके से सक्रिय होकर पैसे के दम पर शासन-प्रशासन-जनता को अपने पैरों की जूती समझने लगे.

राजनीति से विमुख होती पीढ़ी के बीच राजनीति में आने की इच्छुक पीढ़ी भी दिखाई दी. ये किसी भी तरह का सुखद संकेत करती नजर नहीं आई वरन इस पीढ़ी के मन में भी जल्द से जल्द अधिकाधिक धन पैदा करने, अकूत संपत्ति बनाने, बड़ी-बड़ी, मंहगी गाड़ियों का काफिला रखने की लालसा दिखाई देने लगी. ऐसी विभ्रम की स्थिति के बीच, निराशा के दौर में एक आशा की किरण उस समय जागती दिखी जबकि देश की राजधानी में अन्ना आन्दोलन की शुरुआत हुई. समूचे देश से भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनमानस उठ खड़ा हुआ. लोगों की जागरूकता देखकर लगा कि जिस जनमानस के मन में भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रति नैराश्य भाव जाग चुका था वही जनमानस इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आया है. लगा कि अभी देश में सकारात्मकता की लौ बुझी नहीं है. इसी ज़ज्बे का, जनमानस की इसी भावना का लाभ उठाते हुए अन्ना आन्दोलन के एक सदस्य ने राजनीति में पदार्पण किया. सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलने आये हैं कि जयघोष के साथ उनके द्वारा मुख्यमंत्री पद धारण किया गया. भ्रष्टाचार से जूझती जनता को, जनलोकपाल बिल के लिए संघर्ष कर रहे जनमानस को, राजनीति में सुधार के अवसर तलाशती युवा पीढ़ी को लगा कि अब सही अवसर आया है. अच्छा-अच्छा विचार करते जनमानस को एकाएक उस समय झटका सा लगा जबकि व्यवस्था परिवर्तन करने वाले भी उसी रंग में रंगे दिखाई दिए जिसमें बहुतायत राजनीतिज्ञ रंगे हुए लग रहे थे. सत्ता मिलते ही अचानक विरोधियों के खिलाफ सबूत गायब हो गए. सत्ता पाते ही उनके साथ के लोग भ्रष्टाचार में लिप्त मिलने लगे. अपराधीमुक्त राजनीति देने का दावा करने वालों के साथी अपराधी नजर आने लगे. ये परिदृश्य उन लोगों के लिए अत्यंत कष्टकारी लगा जो वास्तविक रूप से जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे थे. ये स्थिति उनके लिए असहज हो गई जो राजनीति में सुधारवादी दृष्टिकोण से लगातार काम कर रहे थे. वे सब अपने को ठगा सा महसूस करने लगे.

किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में ऐसे लोग हतप्रभ दिखाई दे रहे थे. उनके सामने कोई रास्ता नहीं बचा समझ आ रहा था. स्वच्छ राजनीति की बात करने वाले खुद अस्वच्छता में लिप्त दिखे. भ्रष्टाचारमुक्त राजनीति करने वाले भ्रष्टाचार के पोषक दिखे. जनलोकपाल बिल की वकालत करने वाले उसे भूलते दिखे. इस विषम स्थिति में जनमानस में हताशा, निराशा का माहौल पनपने लगा. वे ताकतें जो राजनीति को अपराध का, भ्रष्टाचार का, माफियागीरी का अड्डा मान रही थी, और तेजी से अपना विस्तार करने लगी. अवैध संपत्ति पैदा करना, संपत्ति पर कब्ज़ा, जाली मुद्रा का प्रसार, नशे के कारोबार का बढ़ना, रिश्वतखोरी को सामान्य शिष्टाचार बना देना आदि-आदि इनके प्रमुख कार्य हो गए. हताश जनमानस और भी निराशा के गर्त में चला गया. राजनीति में स्वच्छता की बात करना उसे कपोलकल्पना लगने लगा. ईमानदार और स्वच्छ छवि वालों की राजनीति में कोई जगह नहीं दिख रही थी. ऐसे माहौल में जबकि आम जनमानस का राजनीति से, राजनीतिज्ञों से, सत्ता के शीर्ष से विश्वास उठता जा रहा था तब केंद्र सरकार का नोटबंदी का कठोर फैसला नरम झोंके के समान नजर आया है. इस कदम से देश की व्यवस्था में, राजनीति में भले ही बहुत अधिक सकारात्मक प्रभाव न दिखाई दे किन्तु सामान्य रूप में एक सन्देश उनके खिलाफ अवश्य गया है जो सिर्फ धन को ही ज़िन्दगी का अंतिम सत्य मान बैठे थे. उनके खिलाफ एक कड़ा सन्देश गया है जो धनबल, बाहुबल से राजनीति को अपनी रखैल की तरह बना बैठे थे. ये फैसला उन लोगों को प्रोत्साहित करेगा जो राजनैतिक सुधार के लिए लगातार संकल्पित हैं. वे अब लोगों को समझा सकते हैं कि सत्ता का शीर्ष यदि चाहे तो परिस्थितियों से लड़ा जा सकता है. ये फैसला उन लोगों के अन्दर से नैराश्यबोध दूर कर सकता है जो मान बैठे थे कि राजनीति में सुधार संभव नहीं, राजनीतिज्ञों के वश का कुछ नहीं. यद्यपि नोटबंदी के फैसले से आम जनमानस को कतिपय कष्ट हुआ है, क्षणिक परेशानी का अनुभव हो रहा है तथापि इससे उसी को दीर्घकालिक लाभ मिलने वाला है. यदि राजनीति के प्रति, राजनीतिज्ञों के प्रति, शीर्ष सत्ता के प्रति जरा सा भी सकारात्मक वातावरण बनता है तो वह देश के विकास के लिए, देश की राजनीति के लिए, देश के नागरिकों के लिए ही लाभप्रद होगा.

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
28/11/2016

“यदि राजनीति के प्रति, राजनीतिज्ञों के प्रति, शीर्ष सत्ता के प्रति जरा सा भी सकारात्मक वातावरण बनता है तो वह देश के विकास के लिए, देश की राजनीति के लिए, देश के नागरिकों के लिए ही लाभप्रद होगा.” आदरणीय डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी ! बहुत अच्छा लेख ! आपके विचारों से सहमत हूँ ! सादर आभार !

rameshagarwal के द्वारा
19/11/2016

जय श्री राम डॉ कुमारेन्द्र जी नोट बंदी से उन लोगो को चोट लगी किनके पास अथाह काला धन है ममता,मुलायम,राहुल केजरीवाल सब इसीलिए चिल्ला रहे केजरीवाल की हालत ये है की उन्हें रात में मोदीजी ही नज़र आती नीद हरम हो गयी उनका एक ही अजेंडा मोदी विरोध जहाँ पुरे विश्व में मोदीजी के इस कदम की सराहना हो रही देश के कुछ नेता संसद को बाधित कर रहे लेकिन इसने देश की काले धन रखने वालो की नीद उडा दी इसका असर अब् दिखेगा सुन्दर विचारो से युक्ता लेख.


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