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अम्मा का जाना

Posted On: 6 Dec, 2016 में

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अभिनेत्री से नेत्री बनने के सफ़र में वे कब लोगों की अम्मा बन गईं, पता ही नहीं चला. भारतीय राजनीति में जयललिता जैसा चमत्कारी व्यक्तित्व कम ही देखने को मिलता है. ऐसा व्यक्तित्व जो न केवल लोकप्रियता के चरम पर रहा वरन आमजन के दिलों में भी गहरे से बैठा रहा. जयललिता की कहानी अपने आपमें एक फ़िल्मी सफ़र जैसी रही. अल्पायु में पिता का देहांत, फिर माँ के दवाब में आकर फ़िल्मी कैरियर अपनाना, राजनीति में आने का विरोध झेलना तथा एम०जी० रामचंद्रन की मृत्यु के बाद उनके परिजनों का विरोध सहते हुए भी जयललिता ने अपनी राजनैतिक जमीन तैयार की. एक ऐसी जमीन जिस पर वे पूरी क्षमता, दृढ़ता के साथ अंत-अंत तक खड़ी रहीं. उन्होंने राजनीतिक पृष्ठभूमि न होने के बाद भी खुद को राजनीति में एक प्रभावशाली चरित्र के रूप में स्थापित किया. उनके जाने के बाद उनके प्रशंसकों, समर्थकों का हताश निराश होना, आत्महत्या का रास्ता चुन लेना, लगातार आँसू बहाना कोई पहली बार नहीं हुआ है. जयललिता के लिए उनके समर्थकों की ऐसी आस्थायुक्त दीवानगी उस समय भी देखने को मिली थी जबकि उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में सजा सुनाई गई थी. ऐसा तब भी हुआ था जबकि न्यायालय के एक आदेश पर उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने से रोका गया था. जयललिता को अम्मा बनाने के पीछे खुद उनका व्यक्तित्व, उनके कार्य प्रमुख रहे हैं.

प्रदेश की महिलाओं में वे विशेष रूप से गरीबों को दिए जाने वाले भोजन और शराबबंदी के फैसले के कारण लोकप्रिय हुईं थी. राजनीतिक कारणों से उनके लिए फैसले कुछ भी कहानी कहते हों, उनके जेवरों, कपड़ों, सैंडलों के जबरदस्त संग्रह भले ही उनको विलासी प्रवृत्ति का दर्शाते हों मगर महिलाओं, बालिकाओं के लिए उनके द्वारा किये गए कार्यों ने उन्हें अम्मा बना दिया. वे महिलाओं, बच्चियों की सुरक्षा, उनकी समस्याओं के समाधान को लेकर लगातार चिंतित रहीं. इसी कारण वे अक्सर संवेदनशील निर्णय लेकर अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन करती रही. उनके द्वारा शुरू की गई ‘क्रेडल बेबी स्कीम’ और ‘अम्मा बेबी किट’ को इसी रूप में देखा जा सकता है. ‘अम्मा बेबी किट’ में दिए जाने वाले सामानों के कारण मिली प्रशंसा के बाद सस्ता भोजन देने वाली उनकी ‘अम्मा कैंटीन योजना’ ने आम आदमी को आकर्षित किया. अपने जनहित के ऐसे निर्णयों के साथ-साथ वे अक्सर कठोर निर्णय लेने के कारण भी जनमानस में लोकप्रिय रहीं. दोबारा सत्ता में आने के बाद उन्होंने मंदिरों में पशुबलि रोकने, लाटरी बंद करने, एक निश्चित आय से अधिक आय वालों के राशन कार्ड निरस्त करने जैसे कठोर निर्णयों से भी वे लोकप्रियता का अपना ग्राफ बढ़ाती रहीं. गरीबों, जनसामान्य, महिलाओं के हितार्थ लिए गए उनके निर्णयों ने जहाँ उन्हें जनमानस में लोकप्रिय बनाया वहीं राजनैतिक जीवन में उनके द्वारा लिए गए निर्णयों ने उन्हें भारतीय राजनीति का करिश्माई व्यक्तित्व बनाया.

एम०जी० रामचंद्रन के साथ आरम्भ की गई उनकी राजनैतिक यात्रा में बहुत बार उनको विरोध का सामना करना पड़ा. उस विरोध के बाद भी वे लगातार आगे बढ़ती रहीं. 1984 में उनको पार्टी का विरोध सहना पड़ा मगर वे एमजीआर की कृपा से राज्यसभा पहुंची. लोगों की दृष्टि में इसे विशुद्ध कृपा ही माना गया क्योंकि पार्टी स्तर पर भी ऐसी हवा बनी हुई थी. इसके साथ-साथ जयललिता का वो कार्यकाल ऐसा रहा भी नहीं कि कुछ विशेष माना जाये. इसके बाद भी वे अपने आपको अपने संकल्प और दृढ निश्चय के कारण स्थापित करती रहीं. एमजीआर के देहांत के बाद जैसे उन्होंने समूची पार्टी को अपने नियंत्रण में ले लिया. हठी, अक्खड़, तुनकमिजाज आदि जैसी छवियों के बाद भी वे पार्टी में पहले से लेकर दसवें पायदान पर खुद ही खड़ी थी. ये उनके व्यक्तित्व का चमत्कार ही कहा जायेगा कि केंद्र सरकार को दिए जाने वाले समर्थन के बाद भी वे अपने गठबंधन वाले दलों से स्थायी रिश्ता नहीं रखती थी. कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को समर्थन देने के बाद भी उनपर स्वार्थपरक राजनीति करने का ठप्पा नहीं लगा. इस साफ-सुथरी छवि बने रहने का कारण आम आदमी के हितार्थ उनका काम करना रहा है.

एक ऐसे समय में जबकि वे नितांत सामान्य परिवार से आई हों राजनीति में एक स्तम्भ बन जाना चमत्कार ही कहा जायेगा. पार्टीगत विरोध के बाद भी खुद को स्थापित करना हो, कपड़ों, सैंडलों के भव्य भंडार की कहानी हो, उनके द्वारा दत्तक पुत्र की परीलोक कथाओं जैसी शादी की चर्चा हो, आय से अधिक संपत्ति का मामला रहा हो, समर्थन वापसी के कारण एक वोट से अटल जी की सरकार का गिरना रहा हो, सोनिया को समर्थन देने के बाद भी उनके साथ मंच साझा न करने का हठ रहा हो, कई-कई बार मुख्यमंत्री पद संभालना रहा हो, आमजन का उनके प्रति अगाध विश्वास-आस्था का होना रहा हो आदि-आदि सबकुछ उन्हें विराट स्वरूप प्रदान करते हैं. उनका जाना भारतीय राजनीति के एक स्तम्भ का जाना तो है ही, महिलाओं, बेटियों, गरीबों की अम्मा का जाना भी है.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
06/12/2016

जय श्री राम आदरणीय डॉ कुमारेंद्रू जी अम्मा के निधन ने तमिलनाडु के लोगो का प्रिय नेता चीन लिया जो दृश्य देखने को मिला वैसा बहुत कम होता है उन्होंने लोगो के लिए बहुत काम किया तमिलनाडु में उनके निधन से फर्क तो पड़ेगा लेकिन देश की राजनीती भी प्रभवित होगी .फिल्मो से एक सफल प्रसिद्ध और जनता के ह्रदय में जगह और आत्मत्व पैदा करने वाले नेता बहुत कम होते है.उनकी जगह भरना फिलहाल बहुत अच्छा लेकिन सबसे बड़ा गुण था परिस्थितियो से लड़ कर विजय प्राप्त करना.सुन्दर लेख.

    आभार आपका, जी सही कहा आपने. न केवल तमिलनाडु वरन दिल्ली सरकार भी प्रभावित होगी. यकीनन उनके गरीबों, महिलाओं के लिए किये गए कार्य उनको सदैव जीवित रखेंगे.


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