मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

501 Posts

1197 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3358 postid : 1300617

अपेक्षित चुनाव सुधार करे आयोग

Posted On: 18 Dec, 2016 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

प्रत्येक जिम्मेवार नागरिक, जो किसी भी रूप में देशहित में कार्य करना चाहता है, देशहित के प्रति सचेत रहता है वो निर्वाचन की वर्तमान प्रक्रिया से चिंतित दिखता है. भले ही निर्वाचन प्रक्रिया में अब मतदाताओं को डराने के, फर्जी मतदान के, बूथ कैपचरिंग के आँकड़ों में कमी आई हो मगर स्थिति चिंताजनक है ही. अब सीधे-सीधे ऐसे कदमों का उपयोग न होकर निर्वाचन में अनेक तरह के अप्रत्यक्ष कदमों का प्रयोग किया जाने लगा है. अपने चुनावी खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा में दिखाकर परदे के पीछे से कहीं अधिक खर्च किया जाता है. बड़ी संख्या में अनजाने स्रोतों से मतदाताओं को धन मुहैया करवाने, उनकी जरूरत का सामान उन तक पहुँचाने के साथ-साथ अन्य तरीकों से भी उनको मतदान के लिए एक तरह का लालच दिया जाता है. मतदाताओं को धनबल से अपनी तरफ करने के साथ-साथ मीडिया के द्वारा भी चुनाव को, मतदाताओं को अपनी तरफ करने का प्रयास प्रत्याशियों द्वारा किया जाता है. बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आये हैं जिनमें कि ‘पेड न्यूज़’ के रूप में खबरों का प्रकाशन-प्रसारण किया जाता है.

इनके साथ-साथ बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, बड़ी-बड़ी लग्जरी कारों के दौड़ने ने भी निर्वाचन प्रक्रिया को खर्चीला बनाया है. भले ही तमाम प्रत्याशी ऐसे खर्चों को निर्वाचन आयोग की निर्धारित सीमा से बाहर रखने में सफल हो जाते हों किन्तु वे कहीं न कहीं सम्पूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं. मतदाताओं पर, लोकतंत्र पर ये प्रभाव नकारात्मक रूप में ही होता है. धनबल की अधिकता बाहुबल में वृद्धि करती है, जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि राजनीति का अपराधीकरण होने लगा. राजनीति में ऐसे लोगों की उपस्थिति बढ़ गई जिनका आपराधिक जगत में, आपराधिक कृत्यों में बोलबाला रहा है. ऐसे लोगों ने लोकतंत्र की वास्तविकता को कहीं हाशिये पर लगाकर राजनीति को अपनी तरह से, स्वार्थ में उपयोग किया. राजनीति में आने का, जनप्रतिनिधि बनने का इनका उद्देश्य महज धन कमाना रह गया.

इससे जहाँ मतदाताओं में चुनावों से मोहभंग हुआ है वहीं लोकतंत्र के प्रति, राजनीति के प्रति वितृष्णा सी जगी है. ऐसी मानसिकता के चलते बेईमान, राजनीति को बाजार समझने वाले, अपराधी प्रवृत्ति के लोगों ने राजनीति को अपना ठिकाना बना लिया. ऐसे लोग निर्वाचित होने के बाद सम्बंधित क्षेत्र की उपेक्षा करते भी देखे गए हैं. अपने क्षेत्र के मतदाताओं के प्रति ऐसे लोग असंवेदनशील बने देखे गए हैं. क्षेत्र के विकास से कहीं अधिक ये लोग अपने विकास को उन्मुख दिखाई देते हैं. लोकतान्त्रिक व्यवस्था की अपनी सीमाओं के चलते, निर्वाचन की अपनी व्यवस्थाओं के चलते एक बार विजयी हो गए प्रतिनिधि को निश्चित समयावधि तक सहना मतदाताओं की मजबूरी बन जाता है.

निर्वाचन आयोग को अब इस दिशा में कार्य करना चाहिए कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में किसी व्यक्ति के बजाय वहाँ राजनैतिक दल ही चुनाव में उतरे. सम्बंधित क्षेत्र में जिस राजनैतिक दल की विजय हो वो अपना एक प्रतिनिधि सम्बंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि के रूप में भेजे, जो अपने कार्यों के आधार पर ही निश्चित समयावधि तक कार्य करेगा. इससे एक तरफ मतदाताओं को उस व्यक्ति के कार्यों के आधार पर उसकी स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता को निर्धारित करने का अधिकार मिल जायेगा.

धन के अपव्यय को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को किसी भी तरह की प्रकाशित प्रचार सामग्री पर रोक लगानी होगी. बैनर, होर्डिंग्स, स्टिकर, पैम्पलेट आदि को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. मतदाताओं को सिर्फ अपने बैलट पेपर का नमूना प्रकाशित करके वितरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए. इससे अनावश्यक तरीके से, अवैध तरीके से प्रचार सामग्री का छपवाया जाना रुक सकेगा. देखने में आता है कि प्रशासन की आँखों में धूल झोंककर स्वीकृत गाड़ियों की आड़ में कई-कई गाड़ियों को प्रचार के लिए लगा दिया जाता है. इसके साथ ही डमी प्रत्याशियों के दम पर अनेकानेक गाड़ियाँ प्रचार में घूमती पाई जाती हैं. निर्वाचन आयोग को चार पहिया वाहनों से प्रचार पर पूर्णतः रोक लगानी चाहिए. सिर्फ उसी वाहन को अनुमति मिले जिसमें प्रत्याशी स्वयं बैठा हो, उसके अलावा किसी भी तरह के चौपहिया वाहन से किया जा रहा प्रचार अवैध मानकर प्रशासन द्वारा अपने कब्जे में लिया जाये. यहाँ निर्वाचन आयोग को समझना चाहिए कि जिस दौर में तकनीक आज के जैसी सक्षम नहीं थी तब भी बिना चौपहिया वाहनों के प्रचार हो जाया करते थे. आज प्रत्याशियों को तकनीक लाभ उठाने पर जोर दिया जाना चाहिए. चौपहिया वाहनों पर रोक लगने से जहाँ एक तरफ पेट्रोलियम पदार्थों की अनावश्यक बर्बादी को रोका जा सकेगा. साथ ही चुनाव के खर्चे पर भी अंकुश लग सकेगा.

निर्वाचन आयोग का कार्य जहाँ निष्पक्ष चुनाव करवाना है वहीं उसका दायित्व ये भी देखना होना चाहिए कि चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक व्यक्ति किसी तरह से धनबलियों का शिकार न हो जाये. यद्यपि वर्तमान दौर अत्यंत विषमताओं से भरा हुआ है तथापि कुहासे से बाहर आने का रास्ता बनाना ही पड़ेगा.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
18/12/2016

आदरणीय कुमारेन्द्र साहब, सादर अभिवादन! आपके सभी सुझाव उचित हैं, पर राजनीतिक पार्टियों को धन संग्रह और आय कर से मिली छूट को तो हटाया ही नहीं गया! सबको डिजिटल का सन्देश पिलाया जा रहा है चुनाव प्रचार कब डिजिटल होगा. रैलियों, गाड़ियों, पोस्टरों में अंधाधुंध खर्च कैसे बाद होगा? इन खर्चों को वहां करनेवाले अपना फायदा देखेंगे ही. सादर!

    आभार आपका, चुनाव प्रचार भी जल्द डिजिटल होगा. अभी तक तो ये भी नहीं पिलाया जा रहा था. धीरे-धीरे सब पीने की आदत हो जाएगी. धैर्य रखिये. विगत ५०-६० साल का कूड़ा एक-दो साल में नहीं हटेगा.


topic of the week



latest from jagran