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पर्यावरण हित में पॉलीथीन को नकारना ही होगा

Posted On: 5 Jun, 2017 में

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वर्तमान विकास के दौर में समाज पर्यावरण संकट के दौर से भी गुजर रहा है. वास्तविकता यह है कि इस संकट को खुद मनुष्य ने उत्पन्न किया है. इसके लिए किसी शक्ति को, किसी परमात्मा को, किसी प्राकृतिक आपदा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. मनुष्यों के द्वारा उत्पन्न किया गया पर्यावरण संकट आज मानव समाज के सामने एक चुनौती के रूप में आया है. विकास की अंधी दौड़ में इन्सान ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों को विस्मृत कर दिया है. मानव ने आदिमानव से महामानव बनने के क्रम में प्रकृति को इस बात की परवाह किये बिना क्षतिग्रस्त किया है कि उसकी संतति प्रकृति से क्या पाएगी. स्व-विकास में लिप्त, स्वार्थ में लिप्त इंसान के लिए सोचने का भी समय नहीं कि जिस पर्यावरण में वह साँस ले रहा है, जिस प्राकृतिक वातावरण में वह जीवनयापन कर रहा है उसको नष्ट कर देने से सर्वाधिक नुकसान वह स्वयं का ही कर रहा है. दुष्परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट सामने आया है.

सामान्य रूप से पर्यावरण का पारिभाषिक सन्दर्भ संस्कृत के परि उपसर्ग में आवरण शब्द को सम्बद्ध करने से लगाया जाता है अर्थात ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति, जीवधारी, वनस्पति आदि को चारों तरफ से आवृत्त किये हो. पर्यावरण के सामान्य अर्थ से इतर यदि इसका सन्दर्भ निकालने का प्रयास किया जाये तो ज्ञात होता है वर्तमान में जो कुछ भी ज्ञात-अज्ञात हम अपने आसपास देख-महसूस कर रहे हैं, वो सभी पर्यावरण है. हमारे आसपास, हमारे लिए जीवन की एक सम्पूर्ण व्यवस्था का निर्माण करता है, उसे हम पर्यावरण कहते हैं. इसमें सजीव-निर्जीव वस्तुएँ, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, हवा, पानी, मिट्टी, वनस्पति, सूर्य, चंद्रमा, तारे, धरती, आकाश आदि सभी समाहित किये जाते हैं. जल, धरती, आकाश, वायु आदि सभी के साथ वर्तमान में उसका व्यवहार दोस्ताना नहीं रह गया है वरन इनका अधिक से अधिक उपभोग करने की मानसिकता के साथ मनुष्य काम कर रहा है.

विकास के नाम पर शनैः-शनैः प्रकृति को क्षतिग्रस्त करके पर्यावरण में असंतुलन पैदा किया जा रहा है. सुख-समृद्धि के लिए उठाये जा रहे अदूरदर्शी क़दमों के कारण प्रकृति में जबरदस्त असंतुलन देखने को मिल रहा है. ओजोन परत में छेद होना, ग्लेशियरों का पिघलना, अम्लीय वर्षा का होना, बेमौसम की बरसात का होना, बर्फ़बारी की घटनाएँ आदि इस असंतुलन का दुष्परिणाम हैं. जल, वायु, ध्वनि, मृदा आदि प्रदूषण से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन मानव जीवन के साथ-साथ वन्य प्राणियों के, वनस्पतियों को खतरा पैदा कर रहा है. कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों से निकलती कार्बन मोनो आक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसें, बिजली ताप घर से निकलती सल्फर डाई आक्साइड, धूम्रपान से निकलता विषैला धुआँ, तथा अन्य रूप में वातावरण में मिलती निकोटिन, टार अमोनिया, बेंजापाईरिन, आर्सेनिक, फीनोल मार्श आदि जहरीली गैसें व्यक्तियों, जंतुओं, वनस्पतियों आदि को व्यापक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं. ऐसे में इनसे बचाव के तरीके, इनकी रोकथाम के प्रयासों, प्रदूषण को कम करने पर विचार, पर्यावरण संतुलन बनाये जाने सम्बन्धी प्रयासों, प्रदूषण दूर करने-कम करने संबंधी क़दमों आदि की चर्चा अत्यावश्यक तो है ही, उनको अमल में लाया जाना उससे भी ज्यादा आवश्यक है.

इसमें भी हम देखते हैं कि सर्वाधिक नुकसान पॉलीथीन से होता समझ आ रहा है, दिख भी रहा है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें पाली एथीलीन होती है जो एथिलीन गैस बनाती है. इसमें पालीयूरोथेन नामक रसायन के अतिरिक्त पालीविनायल क्लोराइड (पीवीसी) भी पाया जाता है. पॉलीथीन हो या कोई भी प्लास्टिक, उसमें पाये जाने वाले इन रसायनों को नष्ट करना लगभग असंभव ही होता है क्योंकि प्लास्टिक या पॉलीथीन को जमीन में गाड़ने, जलाने, पानी में बहाने अथवा किसी अन्य तरीके से नष्ट करने से भी इसको न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही इसमें शामिल रसायन के दुष्प्रभाव को मिटाया जा सकता है. यदि इसे जलाया जाये तो इसमें शामिल रसायन के तत्व वायुमंडल में धुंए के रूप में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं. यदि इसको जमीन में दबा दिया जाये तो भीतर की गर्मी, मृदा-तत्त्वों से संक्रिया करके ये रसायन जहरीली गैस पैदा करते हैं, इससे भूमि के अन्दर विस्फोट की आशंका पैदा हो जाती है. पॉलीथीन को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस धुंए के रूप में वायुमंडल से मिलकर ओजोन परत को नष्ट करती है. इसके साथ-साथ पॉलीथीन को जमीन में गाड़ देना भी कारगर अथवा उचित उपाय नहीं है क्योंकि यह प्राकृतिक ढंग से अपघटित नहीं होता है इससे मृदा तो प्रदूषित होती ही है साथ ही ये भूमिगत जल को भी प्रदूषित करती है. इसके साथ-साथ जानवरों द्वारा पॉलीथीन को खा लेने के कारण ये उनकी मृत्यु का कारक बनती है.

ये जानते-समझते हुए भी बहुतायत में पॉलीथीन का उपयोग हो रहा है. यद्यपि केन्द्रीय सरकार ने रिसाइक्लड, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स के अन्तर्गत 1999 में 20 माइक्रोन से कम मोटाई के रंगयुक्त प्लास्टिक बैग के प्रयोग तथा उनके विनिर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध वर्तमान में सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं. इसका मूल कारण पॉलीथीन बैग की मोटाई की जांच करने की तकनीक की अपर्याप्तता है. ऐसे में पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को रोकने का सर्वाधिक सुगम उपाय उसके पूर्ण प्रतिबन्ध का ही बचता है. पॉलीथीन के द्वारा उत्पन्न वर्तमान समस्या और भावी संकट को देखते हुए नागरिकों को स्वयं में जागरूक होना पड़ेगा. कोई भी सरकार नियम बना सकती है, अभियान का सञ्चालन कर सकती है किन्तु उसे सफलता के द्वार तक ले जाने का काम आम नागरिक का ही होता है. इसके लिए उनके द्वारा दैनिक उपयोग में प्रयोग के लिए कागज, कपड़े और जूट के थैलों का उपयोग किया जाना चाहिए. नागरिकों को स्वयं भी जागरूक होकर दूसरों को भी पॉलीथीन के उपयोग करने से रोकना होगा. हालाँकि अभी भी कुछ सामानों, दूध की थैली, पैकिंग वाले सामानों आदि के लिए सरकार ने पॉलीथीन के प्रयोग की छूट दे रखी है, इसके लिए नागरिकों को सजग रहने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे उत्पादों के उपयोग के बाद पॉलीथीन को अन्यत्र, खुला फेंकने के स्थान पर किसी रिसाइकिल स्टोर पर अथवा निश्चित स्थान पर जमा करवाना चाहिए. ये बात हम सबको स्मरण रखनी होगी कि सरकारी स्तर पर पॉलीथीन पर लगाया गया प्रतिबन्ध कोई राजनैतिक कदम नहीं वरन हम नागरिकों के, हमारी भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए उठाया गया कदम है. इसको कारगर उसी स्थिति में किया जा सकेगा, जबकि हम खुद जागरूक, सजग, सकारात्मक रूप से इस पहल में अपने प्रयासों को जोड़ देंगे.

वर्तमान जीवनशैली को, व्यापारिक-वाणिज्यिक स्थिति को, कल-कारखानों-उद्योगों पर मानवीय उपलब्धता, मानवीय रहन-सहन के तौर-तरीकों आदि के चलते ये कल्पना ही लगता है कि सभी लोग पूर्णरूप से पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं किन्तु ये कदापि असंभव नहीं कि एक-एक व्यक्ति खुद को सुधारने का काम कर ले तो पर्यावरण संकट को दूर न किया जा सके. पर्यावरण संकट से निपटने में सबसे बड़ी बाधा व्यक्ति का स्वयं के प्रति ईमानदार न होना ही है और जब तक इन्सान अपने प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करेगा, तब तक इस तरह के अत्यावश्यक कार्यों में समस्या उत्पन्न होती ही रहेगी. इस सम्बन्ध में मनुष्य को ही समाधानात्मक कदम उठाने होंगे. इससे भले ही समस्या पूर्ण रूप से समाप्त न हो पर बहुत हद तक इससे निपटने में सहायता मिल जाएगी.

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