मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

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जोश, जनभावना, जयघोष का संगठित स्वरूप

Posted On: 6 Dec, 2017 में

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उस दिन महज उन्माद नहीं था. उस दिन सिर्फ भीड़ नहीं थी. उस दिन आक्रोश नहीं था. यह इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि उन्माद अराजक हो जाता है. भीड़ अनियंत्रित हो जाती है. आक्रोश हिंसात्मक हो जाता है. उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. ऐसा कुछ था भी नहीं. जनसमूह था. जोश था. नारे थे. तो इन सबके साथ थी भक्ति. लोगों के दिल में थी सांस्कृतिक भावना. सारा जनसमुदाय अपने मन में अपने आराध्य के प्रति श्रद्धाभाव लिए था. एकसाथ हजारों-हजार लोगों का एकत्र हो जाना. बिना किसी नेतृत्व के, बिना किसी सञ्चालन के भी सबके सब भगवा ध्वज के निर्देशन में थे. सबके सब स्व-भाव से संचालित चल रहे थे. बरसों-बरस से अपने अन्य आराध्यों के विरुद्ध चल रही साजिश को देखने के बाद का जागरण था उस दिन. बरसों-बरस से एक समुदाय विशेष के प्रति चली आ रही तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ एक आवाज़ थी उस दिन. उस आवाज़ ने किसी सरकार के खिलाफ कोई उपद्रव नहीं किया. उस जनसमुदाय ने किसी हिंसा का सहारा नहीं लिया. उस भक्ति-भाव से भरे जनमानस ने किसी समुदाय विशेष के प्रति हिंसा का भाव नहीं दिखाया. वे सब उन्मुक्त भाव से सनातन काल से चले आ रहे अपने सांस्कृतिक प्रतीक से दासता का निशान मिटाना चाहते थे. उनके मन में हिंसा नहीं, नफरत नहीं वरन खुद को मुक्त कर लेने का भाव था. अपने आराध्य को दूसरे के प्रतीक चिन्ह से बाहर निकाल लाने का बोध था.

जोश, जनभावना, जयघोष का संगठित स्वरूप उस दिन दिखाई दिया. भगवा ध्वज के केसरिया रंग में सराबोर, जय श्री राम के उद्घोष से धरती-आकाश को एक करते हुए जब धूल का गुबार हटा तो सामने सबकुछ साफ़ था. सांस्कृतिक विरासत पर कब्ज़ा किये बैठी प्रतिच्छाया कहीं दूर-दूर तक नहीं थी. जनसैलाब जिस नियंत्रित रूप से आगे बढ़ा, उसी नियंत्रित रूप से वापस आने लगा. सांस्कृतिक प्रतीकों की मुक्ति का जयघोष अपना असर दिखा चुका था. पावन सरयू नदी की लहरें उन्मुक्तता से वैसी ही हिलोरें मारती नजर आने लगीं. उसने स्वयं में अपना पुराना स्वरूप अपने आसपास निर्मित होते देखा. विध्वंस पश्चात् सनातन मानक पर निर्मित ढाँचा अपने आसपास न देखकर पावन किनारों ने अपने क्रीड़ास्थल को पुनः-पुनः उसी सनातनकालीन स्थिति में महसूस किया. जनसमुदाय के आराध्य, पावन नदी में कभी किल्लोल करने वाले उसके बाल राम, कभी अयोध्या की गलियों, मैदानों में विचरण करने वाले उसके किशोर राम, वनवास के बाद नगरवासियों के ह्रदय में स्थापित उसके राजा राम स्वतंत्र आकाश में अपनी सत्ता का विस्तार पा चुके थे. गुलामी के, विध्वंस के, विवाद के ढाँचे से बाहर निकल वे अब अपने देश के, अपने भक्तों के, अपने मन के प्रतीक में विराजित थे.

कितनी विडम्बना है इस देश के सांस्कृतिक प्रतीक चिन्हों की कि उन्हें अपने होने का सबूत देना पड़ता है. भगवान श्रीराम की जन्मभूमि उनकी अपनी होकर भी उनकी अपनी नहीं हो पा रही थी. सबूतों, गवाहों, बयानों, अदालतों के मानव-निर्मित सत्य वास्तविक सत्य को झुठलाने का कार्य करने में लगे थे. देश में रहकर, देश का दाना-पानी अपने उदर में प्रविष्ट करने वाले ही देश की सांस्कृतिक विरासत को नकारने का काम करने में लगे हैं. देश में जन्मे लोग ही सांस्कृतिक प्रतीकों की बात करने वालों पर गोलियाँ चलवा रहे हैं. देश के सांस्कृतिक पुरुष के समकक्ष विदेशी आक्रान्ता को खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है. जिन आक्रान्ताओं ने देश में विध्वंस, अत्याचार, हिंसा करने के अलावा और कुछ न किया उनकी तरफदारी करने वाले इसी देश के लोग दिख रहे हैं. समय उनकी भी कहानी लिखेगा जो सांस्कृतिक विरासतों को नकारने के नाम पर अपने ही अस्तित्व को नकारने में लगे हैं. किसी विशेष के लिए तुष्टिकरण के नाम पर वैमनष्यता फैलाये हुए हैं. इन सबके बीच दिन तो आते-जाते रहेंगे. विवादों के परिणाम भी जनसमुदाय के द्वारा निकाले जाते रहेंगे. आज नहीं तो कल सांस्कृतिक विरासत के चिन्ह अपनी भव्यता को प्राप्त कर ही लेंगे.

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