मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

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राजनीति का खेल

Posted On: 20 Jan, 2018 में

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इस बात पर शायद ही कोई विश्वास करे कि आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों की सदस्यता को अयोग्य साबित करने में भाजपा या कांग्रेस की तरफ से किसी तरह का षड्यंत्र रचा गया होगा. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि इन बीस विधायकों की सदस्यता पर सवाल इन दोनों राजनैतिक दलों के बजाय एक युवा अधिवक्ता द्वारा उठाया गया है. राजनीति के मैदान में जमे तमाम सारे दल एक जैसी प्रकृति के हैं और ऐसे में उनसे किसी तरह की स्वच्छता की अपेक्षा करना गलती ही होगी. यही कारण है कि विगत तीन वर्षों के दौरान किसी भी राजनैतिक दल के द्वारा आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों के लाभ के पद का मामला नहीं उठाया गया.

इसके साथ ही इस बात पर विश्वास करना भी मुश्किल है कि प्रशासनिक सेवा से राजनीति में उतर आये अरविन्द केजरीवाल को इसका भान नहीं होगा कि उनके द्वारा अपने बीस विधायकों को जिस तरह से संसदीय सचिव बनाया जा रहा है उससे उनकी सदस्यता पर सवाल खड़ा नहीं होगा. लोकपाल बनाये जाने को लेकर रचे गए आन्दोलन के बाद से लेकर सत्ता संभालने तक के सफ़र में अरविन्द केजरीवाल द्वारा लगातार ऐसे कदम उठाये गए जो उनको राजनीति की समझ रखने वाला साबित करने को पर्याप्त हैं. ऐसे में ये समझने वाली बात है कि आखिर राजनीति में स्वच्छता, पारदर्शिता को मुख्य मुद्दा बनाकर उतरी आम आदमी पार्टी की तरफ से ठीक वैसा ही खेल खेला गया जिसके लिए भारतीय राजनीति को वर्तमान में जाना जाने लगा है. बीस विधायकों के मामले के अतिरिक्त हालिया विवादों में राज्यसभा सीटों के तीन आम आदमी पार्टी द्वारा तीन सदस्यों का भेजा जाना भी रहा है. पार्टी के आरम्भिक सदस्यों में और पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके कुमार विश्वास ने राजसभा सीटों के मामले में अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी की थी.

आम आदमी पार्टी ने अपने पहले ही दिन से किसी भी रूप में आम आदमी के बीच ऐसा विश्वास ज़माने की कोशिश नहीं की है जिससे कि माना जाये कि वह भारतीय राजनीति में दिखाई देने वाली गन्दगी को साफ़ करने उतरी है. व्यवस्था बदलने की बात करने वाली ये पार्टी उसी समय संदिग्ध नजर आई थी जबकि अपनी धुर विरोधी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर दिल्ली में सरकार बना बैठी थी. इससे स्पष्ट संकेत मिला कि बाकी दलों की भांति आम आदमी पार्टी भी सत्ता-परिवर्तन का, सत्ता-प्राप्ति का खेल खेलने आई है. इसे उस समय और भी बल मिला था जबकि बिना किसी कारण के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इस्तीफा देकर लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ ताल ठोंकने उतर आये. इस तरह के राजनैतिक कदमों के अलावा दिल्ली की रैली में किसान की आत्महत्या का मामला रहा हो, आम आदमी पार्टी के विधायकों का लगातार किसी न किसी विवाद में फँसते जाना हो, जनता की मदद के नाम पर उसका शारीरिक शोषण करना रहा हो, पानी के बिलों को लेकर किये गए वादों से मुकरना रहा हो, विद्युत दरों के मामले में अलग नजरिया बनाना रहा हो या फिर अपनी पार्टी के ही संस्थापक, सहायक वरिष्ठ लोगों को लगातार बाहर का रास्ता दिखाया जाना रहा हो, सभी ने आम आदमी पार्टी की मानसिकता को ज़ाहिर किया है.

स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी भी किसी तरह की राजनैतिक शुचिता के लिए नहीं वरन विशुद्ध राजनैतिक खेल खेलने मैदान में उतरी है. उसके लिए न स्वच्छ राजनीति से मतलब है न ही व्यवस्था के शुद्धिकरण से. उसके लिए एकमात्र उद्देश्य खुद को कैसे भी करके सत्ता में बने रहना है. यही कारण है कि समय-समय पर उसके द्वारा अराजक लोगों का साथ दिया गया, भ्रष्ट लोगों के साथ मंच साझा किया गया, देश को कमजोर करने वालों के समर्थन में उतरा गया. राजनीति की वर्तमान दशा से चिंतित लोगों में आम आदमी पार्टी के जन्म से एक तरह की आशा जगी थी, उनके सामने एक विकल्प उभर कर सामने आया था मगर अब उन सबकी आशाओं पर तुषारापात हो चुका है. आम आदमी पार्टी उसी तरह के चोले में नजर आने लगी है, जिस चोले में शेष दल रँगे नजर आ रहे हैं. ज़ाहिर सी बात है कि आन्दोलन के नाम पर साथ आये लोगों के मनोभावों से खिलवाड़ करके एक-दो बार तो सत्ता का सुख भोगा जा सकता है किन्तु उसके द्वारा लम्बी यात्रा को पूरा नहीं किया जा सकता है. कहा भी गया है कि काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती और मतदाताओं के लिए भी एक कहावत कही जा सकती है कि दूध का जला, छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है.

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