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मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

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साहित्य को अश्लील होने से बचाना होगा

पोस्टेड ओन: 31 Oct, 2013 जनरल डब्बा में

प्रगतिशीलता के नाम पर, विमर्श के नाम पर साहित्य में आज साहित्यकारों द्वारा व्यापक तमाशा खड़ा किया जा रहा है. साहित्य में इनके नाम से कुछ भी लिखने, छपने की स्थिति दिख रही है. ऐसा माना जाने लगा है कि किसी रचना में जितना अधिक खुलापन होगा, जितनी अधिक अश्लीलता होगी, स्त्री-पुरुष अंतरंगता जितनी अधिक उभर कर दिखेगी वह प्रगतिशील साहित्य माना जायेगा और वो साहित्यकार भी अधिक प्रगतिशील माना जायेगा. ऐसी प्रगतिशीलता में शामिल होने के लिए लिख्खाड़ों की एक लम्बी जमात आज साहित्य-जगत में दस्तक देती दिख रही है. ये लेखक निम्नस्तरीय, अश्लील सी कृतियों को रच करके, जुगाड़ से  पुरस्कार हथिया लेने से खुद को साहित्यकार और अपने लेखन को साहित्य समझने लगे हैं.

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यदि कुछ भी लिख देने को, अश्लील लिख देने को, विमर्श के नाम पर देह-दर्शन को, रतिक्रियाओं का चित्रण करने को साहित्य समझा जाये तो साहित्यकारों और पाठकों को साहित्य की परिभाषा का पुनर्निर्धारण करना होगा. विडंबना तो इस बात की है कि जहाँ साहित्य की मूल भावना को दरकिनार किया जा रहा है वहीं अनेक नौसिखिये अश्लीलतम पोथी तैयार करके साहित्यकारों की नई जमात पैदा करते जा रहे हैं. इन आयातित तथाकथित साहित्यकारों की जो पाठ्य-सामग्री बाज़ार को उपलब्ध मिल रही है, यदि उसको साहित्य माना जाये तो फिर पीली पन्नी की पत्रिकाओं को, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर बिकते उपन्यासों को भी साहित्य समझा जाना चाहिए. इन सस्ते उपन्यासों की बिक्री तो किसी भी चर्चित साहित्यकार की कृति की बिक्री से कहीं अधिक रहती है. और तो और इनके लिए किसी तरह के पुस्तक मेले का आयोजन भी नहीं होता है और न ही उच्च स्तरीय मार्केटिंग की जाती है.

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ये तो याद रखना ही चाहिए कि प्रगतिशीलता नंगा होना नहीं सिखाती है. प्रगतिशीलता के नाम पर, विमर्श के नाम पर साहित्य आज जिस स्थिति में है उसे देखते हुए उन समस्त साहित्यकारों, पाठकों को एकजुट होना होगा जो मानते हैं कि साहित्य के माध्यम से कुछ अच्छा, दिल को छूने वाला, सीख देने वाला आदि पढ़ने को मिलेगा. यदि बहुत जल्दी ऐसा न हुआ तो आने वाले समय में साहित्य के नाम पर स्थापित होने वाली रचनाओं में और सस्ते दर पर बिकती पीली पन्नी की रचनाओं में अंतर कर मुश्किल होगा.

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yogi sarswat के द्वारा
06/11/2013

ये तो याद रखना ही चाहिए कि प्रगतिशीलता नंगा होना नहीं सिखाती है. प्रगतिशीलता के नाम पर, विमर्श के नाम पर साहित्य आज जिस स्थिति में है उसे देखते हुए उन समस्त साहित्यकारों, पाठकों को एकजुट होना होगा जो मानते हैं कि साहित्य के माध्यम से कुछ अच्छा, दिल को छूने वाला, सीख देने वाला आदि पढ़ने को मिलेगा. यदि बहुत जल्दी ऐसा न हुआ तो आने वाले समय में साहित्य के नाम पर स्थापित होने वाली रचनाओं में और सस्ते दर पर बिकती पीली पन्नी की रचनाओं में अंतर कर मुश्किल होगा. सच्चाई कड़वी लगती है , लेकिन जो भी लिखा गया है आपके द्वारा श्री सेंगर साब बिलकुल ठीक लगता है !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
04/11/2013

डॉ कुमारेन्दु    जी,,,, ,सवाल ये पैदा होता है कैसे ,,,होगा यह ,,,,,,,,ब्यवसाय में वही परोसा जाता है जो विकता है ,,,,जिससे अर्थ लाभ हो ,,  जो बिके नहीं उसे छापेगा कौन ,,,,,कौन मारकेटिंग करेगा ,,,,, जो दीखता है वह ही बिकता है वही पडा जाता है वही प्रकाशक को ,विक्रेता को  लाभ देता साहित्य कार को भी प्रोत्साहित करता है ,,मानसिकता को कैसै बदला जायेगा ,,स्कूल कालेज ,आफिस ,टी .वी ,फिल्म , इंटरनैट ,मोबाइल ,सोशल मीडीया ,किस को बदला जा सकता है ,साशन ,प्रसाशन ,कौन सहयोग देगा  ,,,,,,,बडी बडी साहित्यिक पत्रकाये धरासाई हो चूकी है ,जिसे टिकना है उसने बदला या बदलना होगा अन्यथा सब बंद कर घर बैठो या कुछ और ,,,,,ओम शांति शांति शांति ,,,,,

sadguruji के द्वारा
03/11/2013

अच्छे लेह व् दीवाली की बधाई.

    डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
    03/11/2013

    आभार आपका.. +++++++++++++++ आपको भी दीपावली की शुभकामनायें

omdikshit के द्वारा
02/11/2013

आदरणीय सेंगर जी, शुभ-दीपावली. बिलकुल सही कहा आप ने.आज-कल ऐसे सभी लोग सस्ती लोक-प्रियता के लिए अपनी मर्यादाओं का मर्दन करने पर उतारू हो गए हैं. इसे पढ़ने और देखने वालों का भी दोष है.बहुत अच्छा विषय.

    डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
    03/11/2013

    आभार आपका.. आजकल ऐसे लोगों की बाढ़ आ गई है जो साहित्य के नाम पर अश्लीलता परोस रहे हैं.. +++++++++++++++ खैर दीपावली की शुभकामनायें

ranjanagupta के द्वारा
02/11/2013

सेगर जी ,यह सही बात है ,अश्लीलता को आज आधुनिक साहित्य के नाम पर प्रगति शील साहित्य के नाम पर ,सच कहने कासाहस बता कर केवल नग्नता परोसने वाले तथाकथित साहित्य करो की एक लाबी है जो ,जुगाडू भी है और शातिर भी इसका तीव्र विरोध होना चाहिए जो कही दिखाई नहीं दे रहा ,बहूत धन्यवाद !!!

    डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
    03/11/2013

    आभार आपका… अब साहित्य पूरी तरह से जुगाड़ के बलबूते चल रहा है… +++++++++++++++ दीपावली की शुभकामनायें

deepakbijnory के द्वारा
31/10/2013

एकदम सही फ़रमाया आपने

    डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
    03/11/2013

    आभार आपका +++++++++++++++ दीपावली की शुभकामनायें




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