मुद्दे की बात, कुमारेन्द्र के साथ

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डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर


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वोटों के लिए हिन्दू कृत्य भी स्वीकार

Posted On: 13 Oct, 2017  
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विरोध का गिरता स्तर

Posted On: 24 Sep, 2017  
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एक थी नीरजा

Posted On: 7 Sep, 2017  
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हिन्दी ग़ज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार

Posted On: 3 Sep, 2017  
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दर्द और प्रेम से जन्मी अमृता प्रीतम

Posted On: 31 Aug, 2017  
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दद्दा की याद और खेल दिवस

Posted On: 30 Aug, 2017  
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जय श्री राम डॉ. कुमारेंद्रू जी आपका सुन्दर लेख पड़ा समाचार और टीवी माध्यमो से पढ़ कर बहुत दुःख हो रहा की जिस देश की सेना देश की रक्षा के लिए कठिन परिस्थितियो में वलिदान देने के लिए तैयार है उनके साथ इतना गन्दा व्यवहार किया जाय यदि और किसी देश की सेना होती तो लाशे बिछ जाती.हमारे देश के विरोधी नेता जो कुर्सी के लिए सब कर सकते जिन्हें देश में भय का वातावरण दिखाई दे रहा और जो वोटिंग मशीन में बेईमानी की सिकयाय संसद से लेकर राष्ट्रपति जा कर करते पत्थारबाजो के खिलाफ नहीं बोलते ये देश की गिल्ती राजनीती का नमूना है .पिछले 28 दिसम्बर से  हृदय की समस्या थी कानपुर में कार्डियोलॉजी में 6 दिन भारती रहे जहां पेस मेकर लगा लेकिन कमजोरी इतनी की आज की लैपटाप खोल सके .इस फारम को बहुत मिस किया.. हनुमानजी की कृपा रही अभी ज्यादा नहीं आ पाएंगे.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

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के द्वारा: Noopur Noopur

जय श्री राम डॉ कुमारेन्द्र जी बहुत अच्छी जानकारी विविध धर्मो के लिए दी.असल में मुसलमान समय के साथ बदलते नहीं इसीलिये पिछड़े रहते है और दोष सरकार कको देते.दुसरे देश में रहते हुए भी हर बात में हिन्दुओ का विरोध करते.धार्मिक मान्यताये समय के साथ बदलती लेकिन ये नहीं बदलना चाहते जबकि कई मुस्लिम देशो में बहुत सुधार हुए.ये लोग वन्देमातरम,योग सूर्यनमस्कार और अन्य चीजो का धर्म के नाम पर विरोध करते और वोटो के लालची नेता इनका समर्थन भी करते ये देश का दुर्भाग्य जिसतरह विरोध हो रहा वह न्यायालय का अपमान है !ये दुर्भाग्यपूर्ण है कई देशो ने इस कट्टरपंथ को ख़तम कर दिया एक हम लोग रह गए.उम्मीद है सुधर होगा.दुन्दर सूचनाओं के लिए धन्यवाद.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

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जय श्री राम डॉ कुमारेंद्रू जे सेचुलारिस्तो ने इस  देश का इतना नुक्सान किया एंड वे हिन्दू विरोध और अल्प्सख्यक तुस्टीकरण में उतर आये मीडिया भी  इसमें शामिल है यदि यही हिन्दू सन्त कहते तो मीडिया हल्ला मचा देता केवल हिन्दू संतो पर आरोप लगते  मौलवियों और पादरिओ पर नहीं जबकि वे ज्यादा गलत हरकतों में शामिल दादरी की घटना को मीडिया ने महीनो दिखाया माथर टेरेसा ने सेवा की लेकिन उसके पीछे धर्मपरिवर्तन था इसपर हिन्दू संगठनो ने आवाज़ उठाई लेकिन उनकी सुनता कौन है बापू आसाराम जी जेल में मीडिया ट्रायल की वजह से है उन्होंने इसाई मिस्सनरीज के खिलफ धर्मपरिवर्तन की आवाज़ उठाई उन्हें सोनिया गांधी ने झूठे आरोप में फंसवा दिया.केजरीवाल और ममता वहां क्यों गयी मापने बहुत टीक लिखा साधुवाद

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

बहुत ही अच्छा एवं सामयिक प्रश्न उठाता हुआ महत्वपूर्ण लेख है डॉक्टर साहब आपका । सचमुच सोलह वर्षों के निष्ठापूर्ण एवं अहिंसक संघर्ष को अनदेखा करना न तो तर्कसंगत है एवं न ही न्यायपूर्ण । सभी सरकारों ने ऐसा करके शर्मिला के प्रति ही नहीं सम्पूर्ण समाज के प्रति अन्याय किया है तथा इस कष्टप्रद यथार्थ की ही पुष्टि की है कि शासन-प्रशासन केवल हिंसक आंदोलनकारियों की ही सुनता है एवं उनकी अनुचित माँगों के सामने घुटने टेक देने को भी तैयार रहता है जबकि पूर्णतः अहिंसक सत्याग्रही के संघर्ष एवं तर्कसंगत माँग पर न्यूनतम आवश्यक ध्यान भी नहीं देता । ऐसा दृष्टिकोण अपने आप में ही अन्यायपूर्ण है । शर्मिला के अनशन के पीछे ठोस तथ्य एवं तर्क थे एवं उसकी मूल भावना तथा अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा अत्यंत सराहनीय है तथा सत्य के पथ पर चलने वाले अहिंसक लोगों के लिए प्रेरणा-स्रोत है ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

जय श्री राम डॉ कुमारेंद्रू जी बहुत सही कहा नारी सशक्तिकरण के नाम पर उन्हें उन कामो की आजदी की मांग उठा रहे जिससे उनका नैतिक पतन हो कुछ महिला नेताओ ने टीवी पर आने के लिए इस तरह का सस्ती आवाज़ उठाने का काम किया इससे तो पुरी संस्कृति और परिवार की पवित्रता और विश्वास ख़तम हो जाएगा औरते किसी से भी सेक्स कर आये पति मन नहीं कर सकता ये देश को अनितिकता की तरफ झोकने का कार्य है भगवान् के नियमो को बदल नहीं सकते ताजुब नहीं यदि ये भगवान् को कोसे की बच्चे को जन्म मर्द भी दे?इन महिला नेताओ का दिमाग ख़तम हो रहा इसीलिये तलाक के मामले बढ़ते जा  रहे.राष्ट्र के चरित्र को ख़तम करने की साजिस सिनेमा की संस्कृत से परिवार को बचाए.बहुत अच्छा लेख.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

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के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

जय श्री राम डॉ कुमारेन्द्रु जी बहुत अच्छा सटीक तथ्य पूर्ण लेख हमलोगो ने पच्छिम से सब गन्दी आदतें जैसे फैशन नग्न्ता तलाक़ सीख लिए राजनैतिक शुछता नहीं सीखी कांग्रेस के बारे में आज़ादी के बाद गांधी जी ने कहा था की इसको भांग कर दो नहीं दो इसके नेता देश को अंग्रेज़ो से ज्यादा लूटेंगे सही हो रहा बेशर्मी की हद है की जनता को मुंह कैसे दिखते अब एक मार्च निकलने जा रहे ऐसा ही नेशनल हेराल्ड मामले में किया था जद(यू) ऐसे इनको समर्थन देने लगते कोइ शर्म नहीं जनता जान रही ऐसा सबक सिखाएगी की याद करेंगे गुलाम नवी आज़ाद ने राज्य सभा में कहा की मोदी जी ने इटली के प्रधान मंत्री से समझौता किया की २ नाविक के बदले कांग्रेस को फसओ ये मानसिक दिवालिएपन है भगवान् सद्बुद्धि दे सोनिआ प्रेम में पागल हो गए सुन्दर लेख के लिए साधुवाद !

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

जय श्री राम डॉ कुमारेन्द्र जी उत्तर प्रदेश में गूंदागार्दी कम नहीं हो रही कल ही एक मंत्री ने खुले आम फायरिंग कर दी क्योंकि संबोधन में चौधुरी नही कहा गया मुस्लिम मंत्री और विधयक बिलकुल नहीं डरते क्योंकि मालूम है वोट बैंक की वजह से कुछ नहीं  होगा हालत बहुत खराब है पुलिस कुछ नहीं कर सकती पार्टी के झंडे लगा गुंडागर्दी करते आज़म खान खुले आम राज्यपाल के खिलाफ मोर्चा खोले है प्रदेश का क्या होगा नहीं कहा जा सकता?दादरी की घटना को आज़म खान ने संयुक्त राष्ट संघ में शिकायत की कोइ कार्यवाही नहीं हुई महिलाओ के प्रति आपतिजनक व्यं मुलायम सिंह जी भी दे चुके.अच्छी समस्या की और ध्यान दिया इसके लिए धन्यवाद्.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

जय श्री राम डॉ कुमारेंद्रू जी आपने आज के मोदीजी विरोध के परिद्रेश्य को बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया सेक्युलर ब्रिगेड जिसमे नेट,एक मीडिया का भाग और बुद्दिजीवी शामिल है ,को मोदीजी की सफलता भा नहीं रही इसलिए कोइ न कोइ मसला उठा देते तीन दिनों से शक्तिमान घोड़े का मामला उठा रहे जबकि सच आ चुला रोहित की आत्महत्या को इतना उछाला लेकिन बाकी ९ पर चुप उत्तरप्रदेश बंगाल कर्णाटक,पुणे में हिन्दुओ दलितों की हत्या पर चुप शर्म आती जब jnu में राष्ट्र विरोधी नारों का भी समर्थन करते है हमने सुना की सऊदी अरब ने मोदीजी को बदनाम करने को मीडिया को खूब पैसा दिया आजकल चुनाव मुद्दों पर कम जाती धर्म पर लड़ा जाता ममता के पच्छिम बंगाल के खतरनाक हालत पर मीडिया चुप क्यों?सुन्दर लेख के लिए साधुवाद

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

जो लोग आर एस एस को गालियां देते हैं, वे स्वयं में देश के लिए कछ नहीं करते हैं. आर एस एस से ईर्ष्या व द्वेष अवश्य रखते हैं. देह में कोई भी विपत्ति आती है जैसे भूचाल, बाढ़, विदेशी आत्क्रमण, आर एस एस हमेशा सबसे आगे रहकर सहायता करते हैं. आदिवासी उत्थान और शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है. कांग्रेस अन्य दलों में अपनी स्थापना से लेकर आज तक कम्युनिस्ट पार्टियां रूस और चीन के गन गाने के अलावा कुछ नहीं किता. कांग्रेस देश को आज़ादी दिलाने का दावा करती है. आज़ादी दिलाने waali कांग्रेस में देश ki sabhi vichaaradhaaraa के लोग shamil the. wah आज ki bofors, 2 G, cwg, koyala ki luteri कांग्रेस से bhinn thi. आर एस एस ek deshbhakt , raashtrwaadi और charitrwaan kogon का sangathan है, jaisa des में कोई doosara sangathan नहीं है. आर एस एस को gaali denewaale paagal kism के लोग हैं.

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जय  श्री  राम  डॉ  कुमारेंद्रू जी  हमने टाइम्स नाऊ और टीवी  में  इस पर डिबेट  और समाचार  सुने  सर  शर्म से झुक जाता है दिल्ली के  एक  केंद्रीय विश्वविद्यालय में जिस  तरह  राष्ट्र  विरोधी  पाकिस्तानी समर्थक  और  आतंकवादियो  के  समर्थन में नारे लगे  पुरे देश के लिए शर्म  की बात  है  इसके पहले  हैदराबाद  में भी ऐसा  ही माहोल  हुआ  था  मोदी सरकार  के  आने के  बाद  सेक्युलर नेता इतने दुखी है की दलित मुस्लिम राजनीती करके देश को तोड़ने की कोशिश कर रहे इसी लिए  सेक्युलर नेता राहुल गांधी,नितीश,ममता,केजरीवाल सब चुप  यदि इसपर लगाम नहीं लगी गयी तो बहुत गंभीर  समस्या हो जायेगी.लेख के लिए साधुवाद.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

डा.कुमारेन्द्र सिंह जी प्रणाम, वास्तव में ही आपने इस अति चिंतनीय व् जवलंत विषय को अपने लेख में उठाया है सही कहा आपने कि, मेनका गांधी जी द्वारा सुझाया गया इस समस्या का हल अति दुरूह व् कठिन है परन्तु उनकी भी ये प्राथमिकता है ऐसा प्रतीत होता है| मेनका जी कुछ हद तक सही भी हैं यदि बच्चे की माता को पूर्णतया जागरूक किया जाए और बच्चे को जन्म देना अथवा किसी तरह कि विसंगति कि सूचना देना उसी की जिम्मेदारी तय कर दी जाये| लिंग परीक्षण करवाना अनिवार्य कर दिया जाए और रिपोर्ट संबंधित विभाग को भेजना अस्पताल के लिए अनिवार्य कर दिया जाये व् कन्या भ्रूण के लिए एक आकर्षक अनुदान राशि तय कर दी जाए व् उसके भुगतान को सुनिश्चित करने की व्यवस्था कर दी जाए तो लिंगानुपात की विषमता में कमी की जा सकती है मुझे ऐसा लगता है | राष्ट्रिय समस्या पर अपनी चिंता जाहिर करने के लिए धयवाद|

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta

के द्वारा: DEEPTI SAXENA DEEPTI SAXENA

जय श्री राम डॉ कुमारेंद्रू जी हमें इस सबके पीछे विदेशी साजिस लग रही जबसे सोनिया गांधी हारी चर्च खुश नहीं इसीलिए राष्ट्रपति ओबामा ने २ बार मर्यादा लांघ कर् देश में अल्पसंख्यको पर चिंता ज़ाहिर की फिर चर्च पर हमले दिल्ली चुनाव के पहले, दादरी पर असहिष्णुता और अवार्ड वापसी का सिल्सिला बिहार के चुनाव के पहले तक और सेक्युलर नेताओ के आंसू और अब फिर आने वाले विधान सभा के चुनाव के लिए रोहित के नाम पर आंसू बहाना किसी ने इस संगठन की निंदा नहीं की जिसने याकूब मेनन की फांसी का विरोध किया और नारे लगाये की एक मनम की जगह १०० मेनन पैदा होंगे सत्ता के लिए ये सेक्युलर नेता देश बेच सकते इनकी निंदा होनी चाइये

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

डाक्टर कुमारेन्द्र जी, नमस्कार ! नए बर्ष की शुभ कामना आपको और आपके परिवार को ! विस्तृत और हकीकत को बयान करने के लिए आप बधाई की पात्र हैं ! मालदा का काण्ड तो पठानकोट एयर बेस से भी ज्यादा चिंताजनक है ! आतंकवादी दुश्मन हैं और उनके खिलाफ अभियान चलाकर उन्हें मौत के घाट उतारा जा सकता है, लेकिन अपने देश के अंदर फ़ैली धर्मानता की खूनी आंधी का क्यातोड हो सकता है ? इस काण्ड को हाई लाईट करने में मीडिया वालों की नानी मरती है, एक हकलाक मरा सारा मीडिया और पूरा विपक्ष सरकार को घेरने लगे थे, इनको अब क्या जहरीले बिच्छू ने काट खाया है ? तुष्टीकरण वोटों की राजनीति ! लेकिन आप जैसे सजग नागरिक इनके मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं ! एक नजर "जागते रहो" पर भी डालें !

के द्वारा: harirawat harirawat

जय श्री राम डॉ कुमारेंद्रू जी ऐसे प्रदर्शन देश के कई इस्सो में हुए उत्तर प्रदेश् राजस्थान कर्नाटक और अभी पुरनिया (बिहार) में हुए लेकिन वोट बैंक की राजनीती के चलते इन प्रदेशो के मुख्या मंत्री चुप मीडिया भी चुप कोइ डिबेट नहीं कोइ अवार्ड वापसी नहीं कांग्रेस,ममता,मुलायम,लालू,केजरीवाल कुर्सी के लिए देश बेच सकते क्या मालदा का विरोध पठानकोट आतंकवादी हमले का समर्थन नहीं इसके बाद पुरनिया में हुआ मुस्लिम जानते है की उनके खिलाफ कोइ कार्यवाही नहीं होगा इसलिए बेफिक्र टोक (राजस्थान) में आईएस के झंडे फह्राहे गए थे जिसपर ९ लोगो के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज.इतने अच्छे फोरम में इतनी कम प्रतिक्रियाये क्यों इस पर भी आप विचार करे अक्स्च्चा लेख.,

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

जनाब डॉक्टर साहेब आपका लिखा हुआ उन लोगों को ज़रूर पसंद आएगा जिनको इन्साफ और हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं क्यूंकि बहुत सी बातें इंसान समझते हुए भी नहीं कहता और बहुत से काम ऐसे हैं जिन्हे वो जानता तो है के ग़लत है मगर फिर भी करता है कारण बहुत होते हैं जैसे इंसान भूख मिटाने के लिए चोरी करता है ये जानते हुए भी के चोरी पाप है भाई को भाई ही इस लिए मार देता है के वो हमसे बड़ा मत बने ये जानते हुए भी के वो हमारा भाई है क्या हुआ भाई ही तो है ये ज़ुल्म है . शायद आप नहीं समझे इसका मतलब ये है के बाबरी मस्जिद सिर्फ एक बहाना है यहाँ तो जान बुझ कर भाई को भाई से लड़ाना है और अपनी कुर्सी के पैर को मज़बूत करना है . दूसरी बात याद रखें के मस्जिद कभी भी उस ज़मीन पर नहीं बनती जिस ज़मीन के मालिक ने अपनी ख़ुशी से मस्जिद के लिए नहीं दी हो या पैसे से मस्जिद के नाम पर नहीं बेचीं हो और किसी भी तरह के नाजायज़ पैसे या जो पैसा मुस्लिम अपने धन का २.५ % जो सालाना ज़कात निकालते हैं या रमजान में जो ३० दिन का फ़ित्र निकालते हैं वो पैसा भी मस्जिद में लगाना हराम है तो भला बताएं किसी दूसरे धर्म स्थल को तोड़ कर मस्जिद कैसे बनाया जा सकता है बाबर राजा था लेकिन वो भी इस्लाम के कानून जानता था शायद आपको मालूम नहीं के औरंगज़ेब के ज़माने में पंडित रामलाल ने अपनी बेटी के साथ इन्साफ देख कर ख़ुशी से औरंगज़ेब को मस्जिद के लिए ज़मीन दिया था . मतलब ये है के ज़रूरी नहीं के हर मुस्लिम नाम वाला मुस्लिम नहीं जो इस्लाम को नहीं जानता सिर्फ नाम रख लेने से मुस्लिम नहीं होता ठीक उसी तरह जिस तरह कोई राम या रहीम नाम रख लेने से राम या रहीम नहीं हो जाता जब तक उसके अंदर राम या रहीम के आदर्श और गुंड ना हों इस लिए आप पहले सोचें समझें फिर बोलें . जोड़ने की बात करें तोड़ने की नहीं .

के द्वारा: Imam Hussain Quadri Imam Hussain Quadri

श्री डॉ कुमारेन्द्र जी करवा चौथ का दिन महिलाओ का पर्व है इस दिन पति ( स्वामी ) इमोशनली ब्लैक मेल किये जाते हैं| कुछ जो अति भावुक होते हैं वह अपनी पत्नी की सलामती के लिए व्रत रखते हैं यह नहीं कह सकती वह भी छलनी की आड़ में चाँद और अपनी पत्नी का मुहँ देख कर व्रत खोलते हैं |कुछ सूरज के डूबते ही चाँद को ढूंडने लगते हैं | यदि काम पर हैं तो घर की और जल्दी से भागते नजर आते हैं | समझ लीजिये पत्नी ने ब्रत रखा है इस दिन हर पति परमेश्वर | हर विवाहिता नई नवेली दुल्हन | 364 दिनों के इंतजार के बाद यह शुभ दिन आता है |जब हम अपने पतियों पर अहसान करती हैं आपकी सलामती हमारे व्रत पर है |कृपया यह हमारा महकमा है इसको हम पर ही रहने दें

के द्वारा: Shobha Shobha

सरकारी क्षेत्र में व्याप्त निकम्मापन और भ्रष्टाचार इसके लिए उत्तरदायी है जहाँ कर्मठता के स्थान पर तिकड़मबाज़ी की कद्र होती है । राजकीय क्षेत्र की कार्य-संस्कृति में वांछनीय परिवर्तन लाने और कर्मठता को सम्मान देने पर ही इस स्थिति में सुधार आएगा । दशकों से भारत में सरकारी नौकरी की छवि ऐसी ही है कि एक बार मिल गई तो मानो दामादी हो गई । हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा । ऊपरी कमाई के अवसर अलग । इसीलिए निकम्मों की फ़ौज सरकारी नौकर बनने के लिए सदा तत्पर रहती है । आरक्षण भी इसीलिए बड़ा लुभावना लगता है और आरक्षित जातियाँ सरकारी नौकरियों पर अपना दावा कभी छोड़ना ही नहीं चाहतीं चाहे कितनी ही सम्पन्न और सक्षम बन जाएं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

जय श्री राम डॉ.सेंगर जी बहुत सटीक और तार्किक लेख लिखा इस देश के सेकुलरवादी नेता और मीडिया बाटने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते है.उत्तर प्रदेश में आज़म खान, कुछ मुस्लिम गुरु म्नितिश,लालू, कांग्रेस और वामदल सबसे बड़े खलनायक है.जो देश में सेकुलरिज्म और भगवाकरण के नाम पर मुसलमानों को उकसा कर देश का नुक्सान कर देश विरोधी कार्य कर राये सिवाय्हमारे यान के कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों और पाकिस्तान को छोड़ कही पर विरोध नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने बहुत तारीफ की इससे  देश का नाम विश्व पटल पर ऊंचा हुआ.मुस्लमान सूर्य की रोशनी क्यों लेते नमस्कार तो धन्यवाद् कहने के लिए कहा जाता,वन्देमातरम पर भी विरोध.रहते यहाँ और सोचते पकिस्तान की.अच्छे लेख के लिए धन्यवाद्.इस फोरम में प्रतिक्रियाव में कंजूसी क्यों?

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

अकेलापन तो सिर्फ अपने 'खुद' अर्थात दिल-के अंदर होता जहां कि उस 'खुदा-का' वास होता है। अपने उस खुद-से स्वयं दोस्ती कर उसे अपनी-ही मोहब्बत-से भर लो जो अगर तो अकेलेपन की यह कमी जो दिल में है उसे दूर करने के लिए किसी को भी कभी भी कहीं भी जाने-की जरुरत नहीं पड़ेगी। ना तो सोशल-मीडिया (फेसबुक, व्हाट्स ऐप ट्वीटर इत्यादि) और ना ही जिसे की आप (वास्तविक-समाज????) समझते हैं वहां। आत्महत्या की अगर बात करे तो सबसे ज्यादा फ़्रस्ट्रेशन और डिप्प्रेशन का शिकार ना सिर्फ सोशल मीडिया बल्कि, पूरी-दुनिया को अपने हिसाब-से नचाने वाले बॉलीवुड की दुनिया के लोग (जिनसे ज्यादा सोशल शायद ही कोई होता होगा) भी होते हैं। कई सारे उदाहरण खोजने पर हमें जरूर मिल जाएंगे :):):):)

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के द्वारा: World Focus World Focus

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कुमारेन्द्र जी, अक्सर अपने माता पिता से सुनता हूँ के "पूत कपूत हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं हो सकती." परन्तु आज की तथा कथित आधुनिकता ने असंभव को भी संभव बना दिया है. कूड़े के ढेर पर भ्रूण या नवजात, नाली में भ्रूण या नवजात, भ्रूण या नवजात को नोचते कुत्ते, जैसी घटनाएं सोचने को विवश करती है के, हम मानव हैं या कुछ और ? यहां दानव या जानवर का प्रयोग नहीं करूंगा क्योंकि ऐसा कृत्य तो वो कर नहीं कर सकते. श्रीमान जी, इसे समाज तो कहा नहीं कहा जा सकता. नेताओं के अनर्गल बयानों को तूल देने वाला मीडिया भी ऐसी घटनाओं को अनदेखा कर देता है. आपके लेख से कुछ जागृति जरूर आएगी. बेहतरीन लेख के लिए आपको साधुवाद.

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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जय श्री राम इस प्रदेश को दंगो की आग में झोकने के लिए आज़म खान बहुत हद तक ज़िम्मेदार है.मुस्लिम तुस्टीकरण की वज़ह से उनकी पूँछ हो रही परन्तु इससे प्रदेश और समाजवादी पार्टी का नुक्सान हो रहा,अगले चुनाव में पार्टी बुरी तरह से हारेगी.दंगे आज़म खान करवाते और नाम हिन्दुओं का.कारगिल युद्ध के बारे में दिए व्यान पर ही उसको निकालदेना चाइये.मुसलमानो का हौसला ओतना बड़ा है की जहां छाए मस्जिद बना लेटव लाउड स्पीकर लगा कर दुशरो को परेशान करते.आज़म खान का रुआब इतना की उनकी बैसों के खो जाने पर पुलिस वाले निकल दिए जाते है.प्रदेश जान समस्याओं से थ्रिस्ट है और आज़म खान हिन्दू विरोधी व्यान देते नहीं थकते.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

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ये तमाम प्रजातियाँ प्रयासरत हैं कि भले ही पागलपन के नाम पर, भले ही मॉडलिंग के नाम पर, भले ही चित्रकारी के नाम पर, भले ही कलाकारी के नाम पर, भले ही कलात्मकता के नाम पर वस्त्र-विहीन ही क्यों न होना पड़े किन्तु अपनी जड़ों से समाज के बहुसंख्यक वर्ग को जोड़ने का कार्य किया जायेगा, लोगों को वस्त्र-मुक्ति आन्दोलन की ओर अग्रसर किया जायेगा. परिधान के बंधनों से परिधान-मुक्तता की ओर चलता, आधुनिकता से अपनी जड़ों की ओर लौटता इनका आन्दोलन सफलता की राह अग्रसर है आखिर इन्हीं जैसे चंद लोग संस्कृति, सभ्यता का नित्य ही बलात्कार कर पाशविकता को जन्म दे रहे हैं; और एहि लोग ज्यादातर हमारे देश और समाज की संस्क्रति को बदनाम भी करते हैं ! बहुत बढ़िया तीखा लेख

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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आदरणीय डॉक्टर साहब ! हार्दिक अभिनन्दन ! आपने मजाक में ही सही,परन्तु लेख के शुरू में बहुत सही कहा है कि कांग्रेस वाले क्या इसीलिए नाराज हैं कि इस बजट में गाँधी नाम से, नेहरू नाम से किसी योजना का सूत्रपात नहीं किया गया.बजाय गाँधी-नेहरू की मूर्तियों की स्थापना के सरदार पटेल की मूर्ति बनाये जाने की बात कही गई ! अंत में आपने बहुत अच्छी बात कही है कि-सरकार अपना काम करने में लगी है, अब आम आदमी को, सामान्य नागरिक को भी देश-हित में कदम उठाये जाने की जरूरत है. सब्सिडी, छूट किसी भी रूप में हमारी विलासिता पूर्ति के लिए नहीं किये जाते; कोई भी प्रावधान बिना हमारी मदद के पूरे नहीं हो सकते; कोई भी योजना बिना हमारे सहयोग के संचालित नहीं हो सकती, ऐसे में हम सभी नागरिकों का प्रयास ये हो कि समवेत रूप में अपने-अपने क्षेत्र में संचालित सरकारी योजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वित कराएँ, सहयोग दें. इससे अपने क्षेत्र का विकास तो होगा ही, देश भी विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेगा ! बहुत विचारणीय और उपयोगी आलेख ! बहुत बहुत बधाई !!

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आपके स्वर कुछ तीखे हैं और एक तरफ़ा हैं शायद आपको पता नहीं के भारत में जितनी मन्दिरेँ हैं उतनी मस्जिदें नहीं हैं और मस्जिद में लाउडस्पीकर एक बनाये गए नियम अनुसार पांच मिनट के लिए अज़ान के लिए प्रयोग किया जाता है समय से पहले या समय के बाद कोई भी मस्जिद के लाउडस्पीकर को नहीं बजाता और जहाँ तक रेलवे स्टेशन या कहीं भी नमाज़ की बात है तो हिन्दुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया की हर ज़मीन पर पांच से दस मिनट के लिए किसी को नुकसान पहुंचाए बिना शांति से नमाज़ अदा की जाती है नमाज़ में न तो शोर या ढोल या बजा या हंगामा नहीं होता खैर जो ज़यादह होता है वही काम वाले से प्रेम करता है ताके उसकी मान सम्मान बढे मुस्लिम हर पार्टी और हर समाज के साथ होता है अगर सभी एक दूसरे का सम्मान और एक दूसरे से प्रेम करें तो हिन्दू के घर में भी मुस्लिम नमाज़ पढ़ सकता है मुस्लिम के घर में भी हिन्दू अपने ईश्वर की पूजा और प्रार्थना कर सकता है लाउडस्पीकर पर अज़ान से उन्हें तकलीफ होती है जो प्रेम नहीं करते बल्कि बहुत से लोगों को अज़ान एक अलार्म का काम करता है जिसे लोग सुन कर अपने समय का अंदाज़ा लगा लेते हैं और अपने काम को समय पर कर लेते हैं ये मैं नहीं बहुत से लोग कहते हैं क्यूंकि अज़ान का समय नित्य समय होता है माफ़ करेंगे अगर बुरा लगा हो तो .

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वोट की राजनीति में राजनैतिक दल बुरी तरह से घिरे हैं और मतदाता आज़ादी के छह दशक से ज्यादा गुजर जाने के बाद भी स्वप्न के आधार पर. कपोल-कल्पनाओं के आधार पर, मुफ्तखोरी के आधार पर मतदान करने निकल पड़ता है. मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त लैपटॉप, मुफ्त टेबलेट, बेरोजगारी भत्ता आदि के चक्कर में मतदाता अपना वोट कहीं भी पटक देने को तैयार रहता है. ऐसे मतदाताओं से धर्म-मजहब-जाति से ऊपर उठकर वोट देने की बात सोचना भी बेमानी है. राजनैतिक दल इस बात को बखूबी समझते हैं, इसी कारण एक मौलाना का वोट देने की अपील धर्मनिरपेक्ष बनी रहती है जबकि किसी छोटे से मंदिर के पुजारी का हिन्दू शब्द बोलना भी घनघोर सांप्रदायिक हो जाता है| absolutely right

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एक दम मोदीमय एकपक्षी लेख है. केजरीवाल एक ऐसे नेता हैं जो अपने मुद्दे और घोषणापत्र से चिपके रहे, बीजेपी के तरह कुर्सी से चिपकने के लिए धर्मपरिवर्तन कर के गठबंधन धर्म नहीं स्वीकार किये. मोदी बनाम अरविन्द की बात सिर्फ मीडिया की दें नहीं है. सोचने की बात ये है कि अरविन्द ने मात्र १ साल पहले जिस राजनैतिक संगठन की नीव रखी उसे उस समय मीडिआ का समर्थन नहीं था, यहाँ तक कि वोट पद जाने के बाद भी मीडिया के पंडित उन्हें बस २ से १० सीट दे रहे थे ,जब जनता ने मीडिआ को मजबूर कर दिया तब मीडिआ को सच सामने लाना पड़ा. कुछ विचारणीय बिंदु हैं १- मोदी की ताकत वर्षों से भारतीय जनमानष को गुमराह कर रहे आरएसएस और बीजेपी हैं जबकि अरविन्द ने अपनी पहचान खुद बनाई है २- अरविन्द भ्रष्टाचार के विरुद्ध विश्वसनीय व्यक्ति है जबकि मोदी के मंत्रिमंडल में भ्रष्टाचारियों की कमी नहीं है.उनका कार्यकाल भ्रस्टाचार से भरा पड़ा है.३- अरविन्द के पास स्वराज और जनलोकपाल जैसा स्पष्ट नीति है जबकि मोदी वही सड़ी गली व्यवस्था को ही आगे बढ़ाना चाहते है,४-अरविन्द की पार्टी के चंदे और मोदी की पार्टी के चन्दे की पारदर्शिता भी दोनों में बड़ा अंतर पैदा कराती है.५-अरविन्द प्रभावी लोकपाल लेन के लिए उपराज्यपाल ,केंद्र सरकार से लेकर बीजेपी कांग्रेस से लड़े जाते हैं जबकि मोदी प्रभावी लोकायुक्त ना आये इस लिए सुप्रीम cort तक चले जाते हैं.६-मोदी या और कोई नेता जनता को कोई अधिकार देने के खिलाफ है जबकि अरविन्द सत्ता जनता के हाथों में देना चाहते हैं. और भी बहुत कुछ है जो अरविन्द को उनकी पार्टी की आयु कम होने के बावजूद दूसरी बूढी पार्टयों से बहुत बड़ा साबित कराती है.

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डॉ कुमारेन्दु    जी,,,, ,सवाल ये पैदा होता है कैसे ,,,होगा यह ,,,,,,,,ब्यवसाय में वही परोसा जाता है जो विकता है ,,,,जिससे अर्थ लाभ हो ,,  जो बिके नहीं उसे छापेगा कौन ,,,,,कौन मारकेटिंग करेगा ,,,,, जो दीखता है वह ही बिकता है वही पडा जाता है वही प्रकाशक को ,विक्रेता को  लाभ देता साहित्य कार को भी प्रोत्साहित करता है ,,मानसिकता को कैसै बदला जायेगा ,,स्कूल कालेज ,आफिस ,टी .वी ,फिल्म , इंटरनैट ,मोबाइल ,सोशल मीडीया ,किस को बदला जा सकता है ,साशन ,प्रसाशन ,कौन सहयोग देगा  ,,,,,,,बडी बडी साहित्यिक पत्रकाये धरासाई हो चूकी है ,जिसे टिकना है उसने बदला या बदलना होगा अन्यथा सब बंद कर घर बैठो या कुछ और ,,,,,ओम शांति शांति शांति ,,,,,

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी,ब्लॉग मित्र चुने जाने पर बधाई.आप का लेख "व्रत से आयु बढ़ती तो कोई स्त्री विधवा न होती" बहुत विचारणीय है और बुद्धिजीविओं के स्तर पर अच्छा है,परन्तु आम जनता जिसके लिए ये त्यौहार मनोरंजन के साधन हैं,त्यौहार के बहाने कपडे व् गहने पाने के साधन हैं और पति-पत्नी के आपसी गिले-शिकवे भी दूर करने के साधन हैं.सबसे बड़ी बात ये त्यौहार बहुतों के नीरस जीवन में कुछ पल के लिए ख़ुशी और रोमांच दे जाते हैं.दुनिया में कोई अमर नहीं है चाहे व्रत रखें या न रखें.आप का लेख गंभीर कर देता है पर आप की खुलकर हंसती हुई फोटो जीवन हँसते हुए जीने का बहुत अच्छा सन्देश देती है.आप का लेख एक लेख "खिलौने खुद बेचने में लगे हैं खिलौने" बहुत अच्छा लगा.

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निस्संदेह ऐसी विपत्ति जो मानव निर्मित है इससे हमें सीखना है हमारे देश के नेताओं , अधिकारीयों मंत्रियों और स्थानीय निवासियों सभी को इससे सीखना चाहिए और भविष्य में जो भी योजनायें बनायीं जाएँ उनका पूर्ण वैज्ञानिक एवं भौगोलिक अध्यन करने के बाद ही उन योजनाओं की शुरुआत करनी चाहिए ताकि विकास ,विनाश का पर्याय न बने आज हजारों की संख्या में पहाड़ों के मूल निवासी अपना सब कुछ गवां दिए. थी, तो यह प्राकृतिक विपदा पर जो हम, कर सकते थे वह करते तो शायद इतनी जाने न जातीं सबसे बड़ी चूक मौसम विभाग द्वारा हुयी की उन्होंने समय रहते इसकी सूचना नहीं दी और सुचना देने के बाद यात्रा को वहीँ रोकने का काम भी नहीं हुवा जिसके कारन मरने वालों की संख्या हजारों में हो गयी वर्ना कुछ जाने जातीं और बहुतों को बचाया जा सकता था राहत कार्य का काम भी देरी से शुरू हुवा और मौसम ने भी साथ नहीं दिया जिसके कारन भी ज्यादा लोगों की जानें गयीं सेंगर जी आपने सही लिखा है धन्यवाद

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केवल कांग्रेस ही नहीं वरन अन्य केन्द्रीय सरकारों ने भी समझौतावादी नरम किन्तु अजीब सी परम्पराओं को जन्म दिया है, जिनके दूरगामी दुष्परिणाम देशवासी आज तक झेल रहे हैं. समझौतावादी और नरम होना कोई कोई बुरी बात नहीं, परन्तु स्वाभिमान व बड़े नुकसान की कीमत पर ऐसा व्यवहार या नीति सर्वथा गलत है, तब यह हमारी कमजोरी है या तो फिर इसमें किसी स्वार्थ का पुट है. ..और वर्तमान कांग्रेसी व गैर कांग्रेसी, लगभग सभी राजनेताओं के स्टेटमेंट्स, व्यवहार, शारीरिक भाषा और अपनी शक्ति के दुरुपयोग से मौकापरस्ती व लालच (सत्ता, धन या यश का) स्पष्टतः दिखाई पड़ते हैं, दूसरी ओर देश की ठोस प्रगति हेतु कोई विशेष चिंता दिखाई नहीं देती. इस समय बस एक कद्दावर गुजराती नेता से कुछ उम्मीदें हैं, शेष कोई अन्य आशा तो इस समय नजर नहीं आती. भगवान् विष्णु की इस देश पर कृपा हो !!

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ऐसी घटनाओं के लिए सिर्फ और सिर्फ महिलाओं के चालचलन पर दोषारोपण कर देना भी समस्या का समाधान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि आज संस्कारों, शुचिता, नैतिक शिक्षा पर बल दिया जाये। यह तो किसी भी रूप में सम्भव नहीं कि यौन-कुंठा के शिकार लोगों को उनकी आवश्यकता की पूर्ति करवाई जाये पर यह अवश्य ही सम्भव है कि उनके मनोविकार को मनोचिकित्सा के माध्यम से दूर करने की ओर भी ध्यान दिया जाये। आधुनिकता के नाम पर आज सेक्स को प्रमुखता से स्वीकार करके देह की नुमाइश, खुलेआम शारीरिक सम्बन्धों की ओर मुड़ने, विवाहपूर्व-विवाहेतर शारीरिक सम्बन्ध बनाने की संस्कृति का चलन जिस तेजी से समाज में फैलता जा रहा है वह आधुनिक उच्छृंखल महिला-पुरुष को तो आवश्यकता की पूर्ति करने के रास्ते उपलब्ध करवा रहा है किन्तु यौन-कुंठित वर्ग यौन अपराधोन्मुख होता जा रहा है। बात तो ठीक है

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

माननीय सेंगर साहब भारत को अपना देश समझने वाला हर देश भक्त और शिक्षित नागरिक आज आप ही की तरह व्यथित है........ बेहद दुःख होता है इन सरकारी चाटुकारों और कांग्रेशी नेताओं की इस बेशर्मी पर ! आपने जिक्र किया पोर्न वीडिओ का मैं आपसे समझना चाहता हूँ क्या कोई इतना बेशर्म भी हो सकता है..........? मैंने एक बार क्राइम पेट्रोल में देखा था एक इसी प्रकार के वीडिओ के सार्वजनिक हो जाने के बाद मात्र १८ साल के एक लडके ने आत्महत्या कर ली थी और ये महापुरुष तो आज कल टी वी पर विवेचनाओं में व्यस्त हैं बाकी लोगों की कमियाँ भी गिनाते हैं ? ये लोग क्या खाते हैं और इनका क्या मकसद हो सकता है मेरी समझ से बाहर है ........कृपया समय मिलने पर समझाने की कोशिश अवश्य करिएगा आपसे मेरा कर-बद्ध निवेदन है !

के द्वारा: dhirchauhan72 dhirchauhan72

परिस्थितियाँ जिस तेजी से करवट बदलती जा रही हैं, उसकी बिना पर अब हर क़यास और विश्लेषण पलक झपकते आउटडेटेड हो जाता है । कानून व्यवस्था का दारोम्मदार जितना पुलिस पर है, उतना ही पब्लिक पर भी । स्थिति यह हो गई है, कि कहीं पुलिस पाजामे के बाहर नज़र आती है, तो कहीं पब्लिक । पिछले एक सप्ताह की ही घटनाओं पर दृष्टिपात करें । नोयडा हो, कुंडा हो, टांडा हो, तरनतारन हो, या फ़िर पटना । यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, कि अब आमजन पर से भी पुलिस, नागरिक प्रशासन एवं कानून का भय या सम्मान का भाव बड़ी तेज़ी के साथ खत्म होता जा रहा है । प्रतिक्रिया में कहीं पुलिस पब्लिक पर, तो कहीं पब्लिक पुलिस पर भारी पड़ती देखी जा रही है । एक के समक्ष अपनी जवाबदेही ढोने की बाध्यता के मध्य परिस्थितिजन्य निर्णय लेने की भी बाध्यता है, तो दूसरी तरफ़ भीड़ व्यवस्था के प्रति भरती जा रही अपनी खीझ को हर मौके पर शांत कर लेने को आतुर दिख रही है । यह मामला मनोवैज्ञानिक और पेचीदा बनता जा रहा है । किसी पर भी दोषारोपण करने से पूर्व हालात को गहराई से समझने की आवश्यकता है ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

मैडम और मखौल जी में कुछ बात हो पाती उससे पहले हुल-हुल बाबा अपना अंगूठा चूसना बन्द करके मैडम के आंचल से बाहर आये और रिरियाते से बोले-‘‘मम्मी, ये नमो-नमो हमने उस डिब्बे से रिकॉर्ड किया है, जिसमें वो खान अंकल बताते हैं, किस करो, डिश करो।’’ मैडम की और तमाम सारे चुप लगाये चाटुकारों की समझ में आ गया कि नमो-नमो का ये सब चक्कर क्या है। तारणहार मखौल जी ने मैडम के कान में फुसफुसा कर कहा कि इस तरह के डिब्बों को, छतरियों को पूरे देश से खतम ही कर दिया जाये वरना किसी दिन ये हम सभी की छत ही उड़वा देंगी। इससे बेहतर तो अपना सत्यम शिवम सुन्दरम है, जो कहो, जैसा कहो वही दिखाता है। इससे पहले कि मैडम कुछ कह भी पाती हुल-हुल बाबा ने अपना राग अलापना शुरू किया-‘‘मम्मी, मुझे भी नमो-नमो सीखना है।’’ मम्मी और बाकी लोग अवाक से रह गये, मैडम न हुल-हुल बाबा के कनपटे में एक सेंक लगाई और चिल्लाते हुए बताया–‘‘ऐसा होने के लिए बहुत लम्बा संघर्ष करना होता है, जनता का सहयोग लेना होता है। परिवार के नाम की माला जपना छोड़ना होता है। हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, इस कारण से हमारा नमो-नमो बनना मुश्किल है। और हां, यदि तुम ऐसी जिद करते रहे तो किसी दिन यहां नमो-नमो का कब्जा होगा।’’हहहाआआआअ गज़ब का आर्टिकल लिखा है !

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आदरणीय कुमारेन्द्र जी,  फ्री सेक्स और गे-कुकर्म के लोग पश्चिमी देशों की तरह अब हमारी संसद, विधान-सभाओं, न्यायालयों, शासन-प्रशासन, महा नगरीय व्यापार आदि में बढ़ते जा रहे हैं | आप के हास्य-व्यंग्य का उन पर कोई असर होने वाला नहीं है | उनकी दबंगई इतनी बढ़ गई है कि बाकायदा उनके लीगल संगठन, न्यायालयों के निर्णय, समर्थित कुसाहित्य, उनकी गंदी पत्र-पत्रिकाएँ आदि अस्तित्व में ही नहीं आ गए हैं, बल्कि भरपूर चलन में हैं | इसलिए उनसे आँख चुरा पाइए और उनकी दबंगई के आगे दुबककर बच पाइए तो गनीमत है | पर हमारे लिए तकलीफ तो यह है कि हमें उनचास करते हुए आप भी उन्ही की जमात में शामिल होने को व्याकुल हैं | खैर, कोई बात नहीं , हम भारत भोंदुओं को छोड़िए, आप का भी जनम सफल हो जाए, शुभ कामनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

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भाई कुमारेन्द्र साहब अपने बहुत ही अच्छे सवाल उठाए हैं पर इसका जवाब आज का समाज नहीं दे सकता क्योकि यह समानता , अधिकार और आधुनिकता की बात करता है । इसका जवाब हमारे अध्यात्म में है । गोपियाँ यमुना में स्नान ....... वहाँ सेक्स नहीं दिखता । व्यास पुत्र शुकदेव स्नान करती नारियों के पास से गुजर जाते हैं  नारियों को शर्म नहीं आती उनमें वह पवित्र आत्मा देखती है पर मोहग्रस्त व्यास में शरीर देख शर्मा जाती हैं ,  विस्तार का न समय है और न जगह इसलिए संकेत करते हुए इतना ही कहना है कि बस फर्क शरीर और आत्मा का है जो आज का तथाकथित आधुनिक समाज नहीं मानना चाहता है । विमर्श अच्छा है , साधुवाद स्वीकारें ।

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

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डाक्टर साहब ,यह लेख बहुत ही समसामयिक है और आपने जो मुद्दे उठाये है उसपर बड़ी गंभीरता से चिंतन होना चाहिए .जय प्रकाश से लेकर अन्ना तक, इससे भी भयंकर आन्दोलन हो चुके है , लेकिन नतीजा ?जिस समस्या को लेकर वे सब आन्दोलन हुए वे दिन दूना रत चौगुना बढ़ गए .सवाल यह नहीं है की उस आन्दोलन का फ़ायदा कुछ नहीं मिला ,आश्चर्य यह है की अब उस पर कभी चर्चा भी नहीं होती .दो चार दिन तो लगता है की लोग आसमान तोड़ कर जमीं पर ला देगे .मौके का फ़ायदा उठाते हुए ऐसी ऐसी माग रखेगे ,जो न तो न्याय सांगत होता है और न तो सम्भव ,मई मानता हु की सरकार नकारा है लेकिन भीड़ की भी तो हनक कही दिखाई नहीं दे रही है.हम फासी फासी चिल्ला रहे है और रोज रेप भी हो रहा है .

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आदरणीय डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, तर्क दिए जा रहें हैं कि फाँसी की सज़ा से पीड़ित महिला की ह्त्या कर दी जाएगी, फाँसी के भय से बलात्कार ख़त्म होने वाला नहीं, ऐसी सज़ा के प्राविधान का दुरूपयोग होगा आदि-आदि, किन्तु दुनिया को हाँकने के जितने भी तौर-तरीके हैं, उनमें न्याय की अहम भूमिका होती है, यह हमें नहीं भूलना चाहिए | महज कुछ फीसदी पाश्चात्य शैली के लोगों को छोड़ दें तो बलात्कार की पीड़िता वैसे भी कहाँ ज़िंदा रह जाती है, बलात्कार ख़त्म न होने की आशंका से न्याय में कटौती कर के चलना अन्याय पर अन्याय है और जहाँ तक बात फाँसी की सज़ा के दुरुपयोग-सदुपयोग की है तो लोकतंत्र में कौन-सा क्षेत्र, व्यवस्था, शक्ति आदि बची है जहाँ दुरुपयोग न हो रहा हो, तो फिर दुरुपयोग की आशंका बालात्कार के न्याय में बाधक क्यों ? वैसे भी मौत की सज़ा हमारे अति उदार-लचीले तंत्र में उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद भी प्राय: कहाँ हो पा रही है: इसलिए बलात्कार के अपराधियों को सिर्फ और सिर्फ फाँसी की सज़ा होनी चाहिए | शेष, इस मुद्दे पर आप के वैचारिक आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सदभावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

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यदि इन विदेशियों से हमें इतना मोह है, इनकी जीवनशैली हमें इतनी भाती है तो हमने इनके अनुशासन को, इनकी कानूनी बाध्यता को, इनके नियम-कानूनों को स्वीकार करने में सहजता का परिचय क्यों नहीं दिया? हममें में से बहुत से लोग आये दिन विदेश की सैर करके लौटते हैं और फिर वहां के नियमों-कानूनों की बढ़ाई करते नहीं थकते हैं। यही लोग गर्व से बताते हैं कि वहां सार्वजनिक स्थल पर थूकने पर जुर्माना लग जाता है; निर्धारित स्पीड से अधिक में गाड़ी चलाने पर जुर्माना लग जाता है; गाड़ी गलत पार्क करने पर जुर्माना लग जाता है….फलां-फलां काम करने पर जुर्माना लग जाता है और फिर वही लोग भारत में आकर क्या करते हैं? जगह-जगह थूक-थूक कर चित्रकारी करना, गाड़ी को अंधाधुंध गति से भगाना, जहां मर्जी आये वहां गाड़ी खड़ी कर देना और भी यथासम्भव हो सके, उन कानूनों की धज्जियां उड़ाना। आखिर उनके दिमाग में विदेशी कानूनों की बढ़ाई करने के साथ अपने देश के कानूनों का सम्मान क्यों नहीं कौंधता है? नहीं ऐसा भला क्यूँ करने लगेंगे हम ? श्री सेंगर साब , मीठा मीठा गप गप और खट्टा खट्टा थू थू ! यही हाल दीखता है ! सही विषय पर बढ़िया और सार्थक लेखन .

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के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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आभार आपका.... आपने जेपी का नाम लिया. एक बात हम सभी को समझनी होगी कि जेपी के आन्दोलन में सारा विपक्ष एकजुट था..इधर यही एकजुट नहीं हैं. पता नहीं आप इनलोगों से मिले हैं या नहीं...इनका रवैया ख़ास तौर से इंडिया अगेंस्ट करप्शन वालों का बिलकुल तानाशाह सा रहता है. आम जनता के बीच आसानी से जुड़ नहीं पाते हैं...ऐसे में राजनीति में सफलता पा लेना मुश्किल है. हम और आप भी चाहते हैं कि बदलाव हो और हम ही घर के भीतर बैठ जाते हैं. हमें अरविन्द जैसे लोगों को मदद करनी होगी पर उसी कीमत पर जब सब कुछ सार्थकता की तरफ जाए आपने कल ही देखा होगा कि अरविन्द अब मुकेश अम्बानी के बहाने कोर्पोरेट पर सवाल उठा रहे हैं. क्या अरविन्द जैसे आई ए एस अधिकारी को ये भान नहीं होगा कि कोर्पोरेट घराने कैसे काम करते हैं...तो फिर अपने जनलोकपाल बिल में उन्हों ने कोर्पोरेट को शामिल क्यों नहीं किया है? अब सवाल उठा रहे हैं.. बहरहाल अब जो होगा देखा जायेगा....

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यह सत्य है कि इस देश की जनता एक स्वच्छ राजनैतिक विकल्प की तलाश में है, उसको अपेक्षा है कि कोई सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति/दल आकर सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ व्यवस्था परिवर्तन भी करेगा किन्तु उसके पहले जनता भी अपने आपको संतुष्ट कर लेना चाहती है. महज इस कारण से कि कोई अपनी प्रतिष्ठित नौकरी को छोड़ कर समाजसेवा में आया है, कई-कई दिनों तक अनशन करता रहा है, एक-दो जोड़ी कपड़ों में ही दीखता है, को लेकर जनता संतुष्ट नहीं होती है. अपने वर्तमान राजनैतिक आन्दोलन में और उससे पूर्व अन्ना-आन्दोलन में एकाधिक मौकों पर केजरीवाल और उनकी टीम के द्वारा बडबोलेपन की स्थिति दिखाई गई, जो राजनैतिक स्थापत्य के लिए कतई सुखद नहीं होती है. मैंने आपके लेखन के साथ साथ श्री जवाहर लाल सिंह जी की प्रातक्रिया को भी ध्यान से पढ़ा ! हमने जेपी के आन्दोलन को नहीं देखा , इसलिए संभव है की हमें एना या केजरीवाल का आन्दोलन ज्यादा प्रभावित करता हो , क्यूंकि हम तुलना नहीं कर सकते ! अब दोनो की राह जुदा हो गयी है , नयी बात नहीं है क्यूंकि एना के हर आन्दोलन के बाद उनकी टीम बदल जाती है ! अब अरविन्द पर आते हैं , प्रधानमंत्री बन जाना कोई एक दिन का काम या परीक्षा पास करने जैसा नहीं है , इसके लिए आपकी काबिलियत के साथ साथ लोग आपकी किस्मत तय करते हैं , ये अलग बात है की कभी कभी लोग नहीं भी तय करते हैं( जैसा मनमोहन ) और अयोग्य लोगों को थोप दिया जाता है ! अरविन्द ने जो राह अपनाई है वो कठिन भी , गलत भी हो सकती है लेकिन उसका उद्देश्य बिलकुल साफ़ है की हमें भारत की जनता को जागरूक करना है और मुझे लगता है अरविन्द इस काम में सफल रहे हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आभार आपका... हम खुद इस आन्दोलन से जुड़े रहे और आज भी ये कहते हैं कि अरविन्द सही काम करें हम उनके साथ हैं. आप स्वयं सोचिये कि केजरीवाल एक विकल्प देने की बात करते हैं..जनता को भी इसकी आवश्यकता है तो क्या ये सर आरोप लगते रहने से होगा? अपने देश की राजनीति में हालत ये है कि गाँव-गाँव तक में संगठन की जरूरत होती है और अभी ये लोग इसमें बहुत-बहुत पीछे हैं. आप खुद विचार कीजिए कि चुनाव होने पर आप किस तरह लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करेंगे....महज आरोप लगा देना कोई जागरूकता नहीं है....और जब विकल्प नहीं होगा तो जनता किसी चोर को ही मत देगी.... इन लोगों को कम से कम जनता के बीच में जाकर संगठन खड़ा करना चाहिए....राजनेता चोर हैं ये हम आप भी जानते हैं बस इनकी चोरी की धनराशि को नहीं बता पा रहे थे.... क्या आपको इसमें आश्चर्य हुआ कि वाड्रा ने घोटाला किया, गडकरी पर घोटाले का आरोप लगा....ये तो आप भी जानते समझते थे....फिर ऐसे आरोपों का क्या फायदा.. यदि विकल्प देना है तो नाम के लिए नहीं...

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आदरणीय डॉ. साहब, नमस्कार! आपका विश्लेषण सही है. जनता हमेशा से ठगी जाती रही है और आगे भी ठगी जाती रहेगी. राजनीति के घाघ कभी नहीं चाहेंगे कि जन आन्दोलन सफल हो. आज की राजनीति और नेताओं में जन हित कम स्व हित ज्यादा है. विकल्प देने को कोई आगे आ नहीं रहा ... तो क्या कांग्रेस या भाजपा या तीसरा मोर्चा ? यही होना है ? अगर सारा मीडिया वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग केवल मीन मेख निकलने का ही काम करेंगे या आगे बढ़कर देश की कमान सम्हालेंगे ? अगर नहीं तो जो हो रहा है या जो होना है ... उसे चुपचाप सहन करते रहना चाहिए! आपके तर्कसंगत विश्लेषण का आदर करता हूँ ... पर कोई राह निकली भी तो चाहिए! अरविन्द या अन्नामें लाख कमियां हो ... आम लोगों में जागरूकता बड़ी है ... मेरा यही मानना है. केजरीवाल के आरोपों से आज हर कद्दावर लोग ब्यथित हैं ....लेकिन वे अपने अन्दर झांकने का प्रयास न करके मीडिया में अपना चेहरा टटोलने की कोशिश कर रहे हैं. मेरे मन में भी जो समझ में आया ... प्रतिक्रिया में लिख दिया ... आगे आप सब विद्वान है.... राह दिखाते तो बेहतर होता. आभार सहित!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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सादर नमस्कार कुमारेन्द्र जी, सूचना के अधिकार के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए लिखा गया आपका लेख, समय की आवश्यकता भी है, आज इस कानून के चलते जितने घोटालों के खुलासे हो रहे हैं, उनसे इसे लाने वाली सरकार भी त्रस्त हो गयी है, आप शायद प्रधानमन्त्री के हालिया बयान से अवगत होंगे जिसमे उन्होंने सूचना के अधिकार पर नियंत्रण लगाने की वकालत इस आधार पर की कि इसका बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है.... इस क़ानून तथा अन्य मज़बूत कानूनों के होते हुए भी अब केंद्र सरकार की नीयत इतनी साफ़ नहीं लगती की वह घपलो-घोटालों पर अपने मंत्रियों और अन्य रसूखदार लोगों की जांच करवाए..... ज़रुरत है ऐसी सरकार को जड़ से उखाड़ फेकने की... http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/

के द्वारा: Anil "Pandit Sameer Khan" Anil "Pandit Sameer Khan"